Thursday, September 15, 2005

ओणम

आज सुबह से(बल्कि कल रात से ही) मस्त मौसम बना हुआ है, खूब बारिश हो रही है भोपाल में, और कल ही अखबार में पढा था कि "मौसम विभाग के अनुसार शहर से मानसून विदा ले रहा है"...धन्य है मौसम विभाग.
वही दूसरी और मेरे गृह राज्य राजस्थान में इस साल फिर अकाल की आशंका है.मेरा गाँव(sorry कस्बा) यहाँ से बस १७० किलोमीटर है..पर इंद्रदेवता वहाँ जाने को तैयार ही नही....
आज ओणम का त्यौहार है. उत्तर भारत में तो किसी को इसका पता भी नही होता , लेकिन दक्षिण में और खासतौर से केरल में यह बडी धूम से मनाया जाता है. मुझे इसलिये याद रह(आ)जाता है क्योंकि केरल के कई स्कूली मित्रों से अभी भी सम्पर्क में हूँ(इन्टरनेट की कृपा से)
मैने भी अपनी जिन्दगी के दो ओणम केरल में ही बिताए हैं. जवाहर नवोदय विद्यालय,मलमपुझा,केरल में जब नवीं और दसवीं की पढाई की. ओणम पर स्कूल में ३-४ दिन का अवकाश हुआ करता था और सभी स्थानीय छात्र अपने अपने घरों पर जाया करते थे.अब चूँकि हम राजस्थानी छात्रों को घर भेज पाना सम्भव नही था(६ दिन तो आने जाने के लिये चाहिये)अतः हमें भी अपने स्थानीय मित्रों के साथ उन्ही के घरों पर भेज दिय जाता था.(हाँ होली दिवाली पर ना छुट्टी मिलती थी न ही कही जाना हो पाता था,पटाखों और रंगों का इंतजाम तक नही हो पाता था :( .पहले वर्ष मैं अनीश के घर गया,वो मुझसे एक या दो साल जूनियर था,और दूसरे साल शैजू के घर जो मेरा ही सहपाठी था, अनीश अब कहाँ हैं, नही पता, लेकिन शैजू से अभी जून में दिल्ली में मुलाकत हो गयी(करीब ८-१० साल बाद मिले हम), बहुत खुशी हुई.

तो केरल के वो ओणम आज तक याद हैं,वहाँ की प्रसिद्ध नौका दौड तो नही देखी पर जो रीति रिवाज और परम्पराएं, खाना-पीना था वो आज तक याद है.
अभी भी कक्षा में एक सहपाठी (मनोज)केरल से है, सुबह उसे ओणम की बधाई दी.दिन में खाने के स्मय उसका कहना था 'hey man! everybody in Kerala might be having feast now, & i m having this Chappati & Sabjee :-X....)

Wednesday, September 14, 2005

हिन्दी दिवस

आज हिन्दी दिवस था.पिछले १५ दिन से "हिन्दी पखवाडा" के तहत कई प्रतियोगिताएं चल रही थी. इन प्रतियोगिताओं मे ज्यादतर स्टाफ सदस्य ही हिस्सा लेते हैं, हम छात्रों में से सिर्फ मैं और भास्कर...और कोई नही...शायद समय के कमी या रुचि की कमी?
तो आज समापन समारोह था..मुख्य अतिथि थे, वरिष्ठ साहित्यकार पद्म श्री रमेश चन्द्र शाह.वैसे भोपाल साहित्यकारों, कवियों एवं कलाकारों का शहर है.भारत भवन में यहाँ नियमित रूप से प्रख्यात हस्तियों के कार्यक्रम होते रहते हैं, लेकिन हमारा दुर्भाग्य, हम आज तक भारत भवन नही जा पाए, रस्ता तक नही मालूम.वही,समय की कमी,थोडा आलस्य भी...
पिछले साल जरूर हमने शायर मंजूर एहतेशाम साहब को संस्थान बुलाया था, लेकिन "पब्लिक" यानि छात्रों को जुटाने में पसीने आ गये थे...और हाँ पिछले हिन्दी दिवस पर डाक्टर विजय बहादुर सिंह मुख्य अतिथि थे तो उनको सुनने का मौका मिल गया था.
तो आज शाह साहब की जो बात मुझे सबसे ज्यादा पसंद आयी वो उनका ये कथन कि अच्छी कविता लिखने के लिये अच्छा गद्य लिख पाना बहुत जरूरी है. उनके व्याख्यान का काफी हिस्सा इसी बात के इर्द-गिर्द था बात हमारे दिल में बैठ गई है और मेरी कोशिश रहेगी कि मैं अब नियमित रूप से गद्य भी लिखूं..चाहे वो कुछ भी हो...
बाकी तो हर साल की तरह हिन्दी दिवस पर जो होता है और जो कहा जाता है वही सब औपचारिकताएं

Monday, September 12, 2005

...तो क्या

कल उषनीश ने एक शेर सुनाया था...क्या था वो तो मैं भूल गया पर अन्तिम दो शब्द याद रह गये जो थे...तो क्या..आज क्लास में बैठे बैठे इसी पर तुकबन्दी की...

तुम क्लास जरूर आ जाया करो,
यहाँ आकर फिर सो जाओ तो क्या?

प्रोफेसर जी कुछ पूँछ लें गर,
बतलाओ या ना बतलाओ तो क्या?

सबसे पीछे की कुर्सी भली,
वहाँ चुप बैठो या बतियाओ तो क्या?

जब क्लास में हों नौ कन्याएं,
बस देख उन्हें मुस्काओ तो क्या?

exam में जब कुछ लिख ना सको,
फिर इधर उधर तकियाओ तो क्या?

जी भर कर फिर फन्डे फेंको,
परिणाम देख गरियाओ तो क्या?

Monday, September 05, 2005

शिक्षक दिवस

आज शिक्षक दिवस है...सभी गुरुजनों को इस अवसर पर नमन्, जैसा कि जीतू जी ने भी कहा है..आज इस मुकाम पे नही होते..अगर आप सब नही होते....
अब सबसे पहले तो दैनिक भास्कर की इस खबर पर नजर डालें.....और फिर इन तुकबन्दियों पर...
1).जनगणना भी वो करें,पोलियो दवा भी पिलाएं,
इससे भी कुछ समय बचे, तो "मिड डे मील" पकाएं,
कोई हमें बताए, बडा यह प्रश्न है भारी,
शिक्षक "शिक्षक" है, या फिर बाबू सरकारी?
2). गुरुजी की जरुरत नही ,कम्प्यूटर क्लास चलाएंगे,
घर बैठे अब शिक्षार्थी के, ज्ञान की प्यास बुझाएंगे.
कम्प्यूटर नही पकडे कान , कम्प्यूटर नही मारे बेंत,
क्या देना है क्या नही, कम्प्यूटर नही जाने भेद.
यहाँ मिलेगा विकी, यही पर "बाबा देसी",
ज्ञान मिलेगा वैसा, जिसकी रही भावना जैसी.

3). कालेज कभी गया नही,Exam में सो गया,
ट्यूशन कभी छोडी नही, चाहे जो हो गया,
परिणाम जब आए, सब बोले चमत्कार हो गया,
वो देखो..पप्पू पास हो गया.

इस खबर को सुन कर एक बहुत तेज और हकीकत के जैसी खबरें देने वाले TV चैनल की संवाददायिनी फुर्ती से पप्पु के पास पहुँची(भई..पप्पू ने एकदम "नासा की परीक्षा में टाप" करने जैसा काम किया है , तो यह तो नेशनल न्यूज बनेगी...और..आखिर कुछ मसाला भी तो चहिये)...

तो पप्प्पू उवाच्.....

मूरख वो प्राणी है, कभी कक्षा में जो गया,
लाईब्रेरी, लेबोरेट्री, इन सबमें खो गया,
ट्यूशन का रस्ता है इन सबमें उत्तम,
खाली कभी लौटा नही, इस रस्ते पे जो गया...
तो समझे भाई लोगों..
इसीलिए...पप्पू पास हो गया.....

Sunday, September 04, 2005

तुम और मैं

यह कविता मुझे बहुत दिन पहले mail forward मै प्राप्त हुई थी..मुझे बहुत पसंद आई और इसे पढ कर मैं खूब हँसा. क्योंकि तब मैं हिन्दी ब्लोग नही लिखता था, अतः मैने इसे अपने अन्ग्रेजी ब्लोग पर जस का तस चिपका दिया था...आज सोंचा के क्यों न यहा भी इसे चिपका ही दिया जाए.इसके रचियता का नाम मालूम नही है..अगर आप जानते हों तो कृपया बताएं..

मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम MA फर्स्ट डिविजन हो, मैं हुआ मेट्रिक फेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम फौजी अफसर की बेटी , मैं तो किसान का बेटा हूँ
तुम रबडी खीर मलाई हो, मै तो सत्तू सपरेटा हूँ
तुम AC घर में रहती हो, मैं पेड के नीचे लेटा हूँ
तुम नयी मारुती लगती हो, मै स्कूटर लम्ब्रेटा हूँ
इस कदर अगर हम छुप छुप कर, आपस में प्यार बढाएंगे
तो एक रोज तेरे डेडी, अमरीश पुरी बन जाएंगे

सब हड्डी पसली तोड मुझे वो भिजव देंगे जेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम अरब देश की घोडी हो, मैं हूँ गदहे की नाल प्रिये.
तुम दीवाली का बोनस हो, मै भूखों की हडताल प्रिये.
तुम हीरे जडी तश्तरी हो, मैं एल्युमिनिअम का थाल प्रिये.
तुम चिकन सूप बिरयानी हो, मैं कंकड वाली दाल प्रिये.
तुम हिरन चौकडी भरती हो, मै हू कछुए की चाल प्रिये.
तुम चंदन वन की लकडी हो, मैं हू बबूल की छाल प्रिये

मै पके आम सा लटका हूँ मत मारो मुझे गुलेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये

मै शनी देव जैसा कुरूप, तुम कोमल कन्चन काया हो
मै तन से मन से कांशी राम, तुम महा चंचला माया हो
तुम निर्मल पावन गंगा हो, मैं जलता हुआ पतंगा हूँ
तुम राज घाट का शांति मार्च, मै हिन्दू मुस्लिम दंगा हूँ
तुम हो पूनम का ताजमहल, मै काली गुफा अजन्ता की
तुम हो वरदान विधाता का, मैं गलती हूँ भगवंता की

तुम जेट विमान की शोभा हो, मैं बस की ठेलमठेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम नयी विदेशी मिक्सी हो, मै पत्थर का सिलबट्टा हूँ
तुम ए. के. सैतालिस जैसी, मैं तो एक देसी कट्टा हूँ
तुम चतुर राबडी देवी सी, मै भोला भाला लालू हूँ
तुम मुक्त शेरनी जन्गल की, मै चिडिया घर का भालू हूँ
तुम व्यस्त सोनिया गाँधी सी, मै वी पी सिंह सा खाली हूँ
तुम हँसी माधुरी दीक्षित की, मैं हवलदार की गाली हूँ

कल जेल अगर हो जाये तो, दिलवा देना तुम 'बेल' प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये

मैं ढाबे के ढाँचे जैसा, तुम पाँच सितार होटल हो
मैं महुए का देसी ठर्रा, तुम 'रेड लेबल' की बोतल हो
तुम चित्रहार का मधुर गीत, मै कृषि दर्शन की झाडी हूँ
तुम विश्व सुन्दरी सी कमाल, मैं तेलिया छाप कबाडी हूँ
तुम सोनी का मोबाइल हो, मैं टेलीफोन वाला चोगा

तुम मछली मनसरोवर की, मैं हूँ सागर तट का घोंघा

दस मंजिल से गिर जाऊंगा, मत आगे मुझे धकेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम सत्ता की महारानी हो, मैं विपक्ष की लचारी हूं
तुम हो ममता जयललिता सी, मैं क्वाँरा अटल बिहारी हूँ
तुम तेन्दुलकर का शतक प्रिये, मैं फालो-आन की पारी हूँ
तुम Getz, Maruti, Santro हो, मैं Leyland की लारी हूं

मुझको रेफ्री ही रहने दो, मत खेलो मुझसे खेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये ......