Wednesday, November 23, 2005

हम फिल्में क्यों देखते हैं - अनुगूँज १५

जब से अनुगूँज का विषय घोषित हुआ है, सोंच रहा हूं, इस बार मैं भी लिख ही दूं वैसे भी यह वर्षगाँठ स्पेशल है, और विषय भी ऐसा है कि इस पर 'कुछ' लिखा जा सकता है.
तो जैसा कि सुनील जी पहले ही 'हम' को परिभाषित करने की कोशिश कर चुकें हैं. यहाँ तो मैं सिर्फ यह लिखूंगा, कि मैं फिल्में क्यों देखता हूँ...
सौभाग्यवश मैने सेटेलाइट व केबल टी.वी. को अपनी उम्र के साथ बढते देखा है,और मेरे विचार में केबल के आने के बाद से ही भारत में फिल्में गाँव ग़ाँव में देखी जाने लगी, अन्यथा, जैसा कि 'बुजुर्ग' लोग कह रहे हैं कि उनके बचपन में सिनेमा जाने पर कितनी पाबंदी होती थी और वैसे भी ये सर्वसुलभ नही होते थे...कभी मेले-तमाशे में जरूर आ जाया करते थे...
तो फिर मूल प्रश्न पर आया जाये, कि मैं फिल्में क्यों देखता हूं.दरअसल अपनी छोटी सी जिन्दगी में उम्र के हर पडाव पर, इस सवाल का मेरा जवाब अलग अलग रहा होता...आज सब जवाबों को एक साथ Compile करने की कोशिश करता हूँ.
फ़िल्में देखने की मेरी पहली यादें जुडी हुई है,'८६-८७ के करीब हमारे पुराने मकान में आये नये नये टी.वी. से. जमाना सिर्फ दूरदर्शन का था और टी.वी.मोहल्ले के ३-४ चुनिन्दा "डिब्बों" में एक (SONY Orson माडल का यह श्वेत-श्याम टी.वी. कई बरस तक हमारे घर का साथी बना रहा और अभी मात्र १०-११ महीने पहले Retire हुआ.)...तो उस समय सप्ताह में मात्र एक फिल्म आती थी, रविवार शाम ५:४५ पर...और वो हम किसी कीमत पर नही छोड सकते थे...फिल्म के बीच में सिर्फ एक 'ब्रेक' हुआ करता था...और फिल्म हम सिर्फ 'लडाई' देखने के लिये देखते थे...यानि फिल्म में अगर लडाई है, तो अच्छी, अन्यथा कोई काम की नही...अच्छा, यह कैसे पता चलेगा कि फिल्म में लडाई है या नही...अजी बडा सीधा सा मापदंड है, अगर फिल्म में अमिताभ, धर्मेंद्र, जीतेंद्र, मिथुन(ये नाम हमें सन ८७ में याद थे...) आदि में से कोई है, तो वो निश्च्चित रूप से लडाई वाली होगी.
मुझे आज भी याद है, कि एक रविबार को अमिताभ अभिनीत "सौदागर" आने पर मैं पूरे घर में खुश होकर चिल्लता फिरा था, लेकिन पूरी फिल्म में लडाई का इंतजार करता रहा.(अमिताभ उस फिल्म में गुड बेचते थे, और मुझे विश्वास ही नही हुआ था कि वो बिना मार-धाड वाली फिल्म भी बना सकते थे)...टी.वी. का कनेक्शन हमारे यहां एन्टीना से ना होकर डिश से था और डिश वाला कभी कभार फिल्म "लगा" दिया करता था, जिसका कि हमें हमेशा इन्तजार रहता था...अनिल कपूर की रामलखन से लेकर मिथुन की प्रेम प्रतिज्ञा तक, हमने डिश (जिसे हम डिक्स बोलते थे)वाले की कृपा से देखी.
कक्षा ६ में हमे मिला अपना वनवास(जिसे आज तक भोग रहे हैं) और हम घर से निकल कर जवाहर नवोदय विद्यालय, पचपहाड पहुँचे.य़हाँ पहले साल खूब फिल्में देखी, स्कूल का खुद का रंगीन टी.वी.-वी.सी,आर.था,और हमे लगभग हर शनिवार-रविवार नई/पुरानी फिल्में दिखाई जाती थी...फिल्म देखने का कोई लोजिक नही, बस फिल्म देखने के लिये फिल्म देखते थे, और एक फिल्म की कहानी और गाने, अगले पूरे सप्ताह चर्चा में रहते थे.
बदकिस्मती से अगले साल टी.वी.-वी.सी.आर. चोरी चले गये और अगले एक्-डेढ साल हम सिर्फ छुट्टियों में घर पर फिल्म देख पाते.उसमें भी Competition होता, कि कौन सबसे ज्याद फिल्में देख कर आता है, बाकायदा एक कोपी में नाम लिख कर लाते थे, और फिर सब फिल्मों की कहानियाँ डिस्कस होती थीं.कक्षा ८ का साल इस मायने में काफी महत्वपूर्ण रहा,हमने पहली बार सिनेमाघर में जाकर फिल्म देखी, इसके पहले, सिर्फ सिनेमा घर का नाम सुना था, कभी देखा नही था.पहली फिल्म जो देखी वो थी "फूल और काँटे"...फिर स्कूल में नया टी.वी. आया.दूरदर्शन ही आता था तब भी, लेकिन सप्ताह में दो फिल्मों के साथ.लेकिन हमें दोनो नही देखने मिल्ती थी, एक दिन सिर्फ लडके, और एक दिन सिर्फ लडकियाँ...ये नियम था हमारे (हाय हाय ये जालिम जमाना...)
अगले दो साल हमने केरल में बिताये और यहां हिन्दी फिल्मों का काफी अकाल रहा...तो क्या हुआ, ममूटी और मोहनलाल से अपना परिचय हुआ.वैसे समझ में ज्याद कुछ नही आता था.स्कूल से १-२ किलोमीटर दूर एक सिनेमा हाल था- कविता(कविथा-साउथ वालों के लिये)...वहां चोरी छुपे जाकर रात्री शो देखे गये(यहाँ पकडे जाने पर लोकल लडकों को Suspend कर देते थे, लेकिन राजस्थनियों को सस्पेंड करके २००० किलोमीटर दूर कैसे भेजते)...फिल्मे देखने का कारण अभी भी वही था, लडाई-मार-धाड ...हाँ अब गानों और हीरोइनों पर भी थोडा ध्यान देते थे,और धर्मेंद्र-जीतेंद्र की जगह अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी ने ले ली थी...
यह क्रम इंजिनियरिंग कालेज पहुँचने तक चला और यहाँ आकर पहली बार हमें खुल्ले सांड की तरह पूरी आजादी मिली...पहले २ सालों में कितनी फिल्में देखी, कोई गिनती नही...अलवर में तीन टाकिज़ थे..."अशोका" "उन" फिल्मों के लिये बुक था और वहां अन्य कोई फिल्म नही लगती थी,बचे 'भारत' और 'गोपाल',तो यहां अंधेरे में बैठ कर हमने कितने घंटे गुजारे, खुद हमें गिनती नही.अलवर में एक फायदा था कि अक्सर नई फिल्म रिलीज होते ही लग जाती थी और टिकट दर बहुत कम थी(मात्र १७ रुपये बलकनी)...यहाँ आकर पहली बार हमें पता चला के नई फिल्में अमूमन शुक्रवार को रिलीज होती है...तो फिल्म प्रथम दिन-प्रथम शो ही होनी...हद से हद शो दूसरा,तीसरा या चौथा हो जाता लेकिन दिन पहला ही होना, चाहे कोई क्लास हो ...टिकट खिडकी पर मची कई मारामारियों और बेल्ट-हाकी युद्धों के हम साक्षात गवाह रहे...लेकिन चाहे १७ कि टिकट ३७ में खरीदें, फिल्म देखे बिना वापस नही...
तीसरे-चौथे वर्ष तक यह खुमार थोडा उतरा, थोडा CD-Computer आने का भी असर पडा, जब दोस्त के घर फोकट में फिल्म देख सकते हैं with चाय, तो टाकिज़ क्यों जायें?अंग्रेजी अखबार भी पढने लगे थे तो फिल्म समीक्षाओं का भी असर होने लगा...बाकी तो कालेज के जमाने की काफी अनुभव आशीष जी से मिलते जुलते हैं...जैसे परीक्षा समय की फिल्में...या फिर पिक्चर हाल में जम कर नाचना और मस्ती करना....(मुझे लगता है कि इस मामले में हर इंजिनियर की जिन्दगी एक जैसी होती है चाहे वो किसी रीजनल कालेज से हो या किसी झुमरीतलैया इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालोजी नुमा संस्थान से)
इंजिनियरिंग कालेज से निकलने के बाद से तस्वीर काफी बदल गई हैं..लगता है, थोडी समझ भी आ गई है(अभी कुछ दिन पहले टी.वी. पर फूल और काँटे देख रह था, अजय देवगन का बाइक पर एंट्री सीन देख कर हँसी आ गई, किसी जमाने में वो मेरी पसंदीदा "लडाई-मार-धाड से भरपूर फिल्म थी")...फिल्में अब जब तक अच्छी रिपोर्ट वाली न हों, नही देखता,२-४ जगह उसकी समीक्षा (रेडिफ पर, TOI में, कुछ दोस्तों से)नही पढ सुन लेता, टाक़िज में फिल्म नही देखता(या फिर तब जब बिल्कुल मूड हो रह हो टकिज़ जाने का, पुरानी यादें तजा करने को)...अधिकतर फिल्में computer पे fast forward mode में देखी जाती हैं...
एक और आदत जो १-२ साल में लगी है, Star movies और HBO की बदौलत, मैं अन्ग्रेजी फिल्में काफी शौक से देखने लगा हूँ...कई फिल्में वाकई काफी रोचक होती हैं और कई फिल्मों के कुछ दृश्य देखते ही पत चल जाता है कि इसे टोप कर पहले ही कोई हिन्दी फिल्म बना दी गई है....क़ालेज टाइम में अंग्रेजी फिल्मों से काफी चिढ थी और HBO को हम Hyper Bhamaabham Operation कहते थे (सोंचिये क्यों)...
हाँ कोई अच्छी हिन्दी फिल्म आती है तो उसे कम्प्यूटर पे नही देखता...या तो टाकिज या ओरिजिनल VCD का इंतजार और वैसे भी साल भर में एक-दो अच्छी फिल्में भी नही आती...
तो अभी तक की तो यही कहानी है, कि मैं फिल्में क्यों देखता हूं

Tuesday, November 22, 2005

भारतीय व्यवसायिक ढाँचे (Indian Business Models)

अमरीका और अन्य विकसित देशों में रहने वाले साहबान तो 'वाल-मार्ट' एवं 'के-मार्ट' जैसे स्टोर्स से परिचित होंगे ही, जहाँ आपको एक ही छत के नीचे तमाम तरह की वस्तुएं उपलब्ध होती हैं...भारत में भी महानगरों में माल-संस्कृति धीरे धीरे अपने पैर पसार रही है और यहाँ धडल्ले से कई रिटेल-स्टोर्स खुल रहे हैं.लेकिन हम आपको दिखाते हैं अपने 'इंडिया' का एकदम देसी शोपिंग स्टोर.आप इसे देसी वाल-मार्ट भी कह सकते हैं.वैसे ज्यादा उचित यह कहना होगा कि वाल मार्ट इन देसी दुकानों का अमेरिकन संस्करण है क्योंकि इन दुकानों के मुकाबले इसकी अवधारणा एक्दम नई है, वाल-मार्ट तो करीब '६० के दशक में अस्तित्व में आये हैं जबकि ये दुकानें, भारतीय गाँवों में सदियों से चली आ रही हैं. एक बात और, कई मामलों में इनकी सेवाएं(services),काफी आगे हैं, मसलन, ग्राहक यहां से सिर्फ सामन ही नही खरीदते, वरन् यहाँ अनाज एवं अन्य 'जींस'बेचे जाने की सुविधा भी है, यानी किसान यहाँ अपनी फसल भी बेच सकता है, और हाँ, एक बात तो हम भूल ही गये, आपको यहाँ, वित्तीय सुविधाएं(Financial Services) भी उपलब्ध हैं , यानी यहाँ से आप ऋण भी ले सकते हैं(यह अलग बात है, कि ब्याज की दर काफी ज्यादा होगी).क़ुल मिला कर, इस प्रकार कि दुकाने आपको भारत के हर छोटे-बडे गाँव में मिल जायेंगी.सदियों से ये दुकाने भारतीय गाँवों की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहीं है...किसान अपनी जरूरत के समय यहीं से ऋण लेता, फसल आने पर यहीं उसे बेचता, मिले पैसों से कुछ ऋण चुकाता, अपनी जरूरत का सामन खरीदता और यह चक्र चलता रहता (हिन्दी फिल्मों में जालिम 'लाला' को तो आपने देखा ही होगा),किसानों के एकतरफा शोषण के आरोप भी इस तरह के उपक्रमों पर लगते रहे, लेकिन इस बात से नही नकारा जा सकता के ये 'संस्थान' भारत के गाँवों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं.
जूते-चप्पल और अनाज की खरीद बिक्री से लेकर....

.....कपडा...


और किराना तक.....

(-तीनों तस्वीरें, उदयपुर के पास एक गाँव से)
अब आपको इसी संदर्भ में 'माडर्न इंडिया' और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जुडी एक बात बताते हैं, क्या आपको पता है, कि आइ.टी.सी.,अपने ई-चौपाल कार्यक्रम के माध्यम से ठीक इसी प्रकार का एक माडल लागू कर रही है, नही....?तो अब जान लीजिये.
आइ.टी.सी. ने अपने ई-चौपाल कार्यक्रम के अंतर्गत देश में विभिन्न स्थानों पर(गावों में)इन्टरनेट से जुडे (VSAT Connection के माध्यम से), कम्प्यूटर रखे हैं ऐसी जगह को 'ई-चौपाल' बोला जाता है, यहाँ किसान अपने उत्पादों के विभिन्न मंडियों के भाव जान सकता है, और तय कर सकता है कि उसे माल कहाँ बेचना है, कब बेचना है...
अब इसके दूसरे चरण पर आइये, इस का अगला भाग है आइ.टी.सी का "चौपाल सागर", यह अभी कुछ ही स्थानों पर है(मैने भोपाल के पास, सिहोर में देखा है), यहां किसान अपने उत्पाद लाकर बेचता है, उस दिन के भावों की पूरी जानकारी, वो अपने ही गांव में ई-चौपाल के माध्यम से पहले ही ले सकता है, माल यहाँ आयेगा, तुलेगा और हाथों-हाथ भुगतान...
अब आइये तीसरे चरण पर, यहीं चौपाल सागर में एक शापिंग-माल भी होता है, जहां घर परिवार कि रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर, कपडा, किराना, बर्तन और मोटरसाइकिल तक, एक छत के नीचे उपलब्ध है, यानी, माल बेचिये, पैसा पाइये, और फिर खरीदारी कीजिये...
यह माडल अभी प्रयोगात्मक रूप में कुछ ही जगहों पर लागू किया गया है, और यह कितना सफल होता है यह देखना बाकी है, किंतु, निश्चित रूप से भारतीय ग्रामीण बाजार्, कंपनियों की हिट लिस्ट में हैं और उसे भुनाने के लिये वे काफी प्रयास भी कर रहे हैं, कुछ आगे हैं तो कुछ पीछे...लेकिन मोटे तौर पर तो यह उसी ढाँचे पर आधारित है, जिसकी बात हमने शुरु में की थी, हाँ एक-दो बातें है, माप-तौल पूरा होता है, भाव ठीक मिलता है, और किसान वहाँ से कुछ भी खरीदने को बाध्य नही है...यह मान जा सकता है कि बदलाव की हवा है, कितनी तेज बहती है, यह अभी देखना है.
एक उदाहरण और आपको दे देता हूँ चलते चलते.य़ह जुडा है उन वित्तीय सुविधाओं से जिनकी बात मैने ऊपर की थी...इस ऋण सुविधा पर ध्यान आकर्षित हुआ है ICICI बैंक का. इस माडल में उनकी उत्सुकता की वजह है, यहां दिये जाने वाले ऋण की लगभग पूर्ण वापसी(Full recovery of loan).पैसा डूबने की दर यहाँ बहुत कम होती है और गिरवी वाले धंधे में भी NPAs(Non Performing Assets) काफी कम होते हैं, जिनसे कि बैंक सदा परेशान रहते हैं.अभी इस पर ज्यादा प्रगति तो नही हुई है, किंतु भविष्य में ऐसी संभावनाओं से इन्कार नही किया जा सकता कि ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक ऋण देने के लिये इस तरह की दुकानों को अपना माध्यम बनाएं, ताकि उन्हे loan recovery की समस्या से न जूझना पडे...
तो है ना ये देसी और माडर्न का अद्भुत घालमेल.........

Monday, November 21, 2005

नजरिया


यह तस्वीर आज मेल में प्राप्त हुई.य़ह एक Optical Illusion(हिन्दी में शायद, दृष्टिभ्रम) है.ज़ब आप दोनो चेहरों जो पास से देखते हैं तो बांई ओर वाल चेहरा गुस्से में प्रतीत होता है और दाँयी ओर वाला सहज मुस्कान में. अब जरा अपनी कम्प्यूटर स्क्रीन से १०-१२ कदम दूर जाइये और पुनः दोनो चेहरे देखिये, स्थिति एकदम विपरीत दिखाई देगी, बाँई ओर वाल चेहरा सामन्य, सहज और दाँयी और वाला गुस्से में...ऐसा क्यों हुआ? तस्वीर वही, देखने वाल मैं वही,बदला क्या? सिर्फ दूरी...या नजरिया?

य़ही बात कई बार मैं असल जिन्दगी में भी महसूस करता हूँ...लोग वही रहते हैं,मिलने वाले, देखने वाले,जानने वाले, पर फिर भी सब कुछ बदल जात है, सिर्फ एक चीज़ के बदलने से...देखने का नजरिया, या फिर कहें, आपका दृष्टिकोण...वक्त, हालत, परिस्थितियाँ, सब कुछ आपके नजरिये(या कहें Perception)पर निर्भर करती हैं...
गिलास किसी को आधा खाली दिखता है, और किसी को आधा भरा,और यहीं सब कुछ इधर का उधर हो जाता है.आप कहाँ खडे हैं, किसके बारे में कैसा महसूस करते हैं, और क्यों करते हैं, सब कुछ यहीं आकर टिकता है.....

Sunday, November 20, 2005

आपके मेल आइ-डी का पता...?

हिन्दुस्तान मे अभी भी अच्छे-अच्छे पढे लिखे और महानगरों में रहने वाले लोगों की इन्टरनेट और कम्प्यूटर के बारे क्या जानकारी और स्थिति है, इसकी एक बानगी...
यह अनुभव अभी हाल ही में अपने हैदराबाद प्रवास के दौरान हुआ...संबन्धित व्यक्ति का नाम नही लिखूंगा, वैसे मुझे आशा नही कि इस लेख तक उनकी नजर कभी पहुँचेगी, फिर भी गर कभी पढें और उन्हे बुरा लगे तो अग्रिम क्षमा...
तो साहब, अपने काम के सिलसिले में मै इन हजरात से मिलने पहुँचा.अपने विषय पर में इनकी जानकारी और पकड वाकई काफी गहरी थी, स्वतंत्र सलाहकार(Private Consultant) होने के अलावा ये उस विषय पर गठित कुछ समितियों के सदस्य भी हैं...पर चूँकि मै उन्हे कुछ सलाह राशि(Consultancy Fee) तो अदा कर नही रहा था बस एक अन्वेषक (Researcher)के नाते जितना कुछ फोकट में झाड सकता था और जितना कुछ वे बिना लिये बता सकते थे...वो मैने उनसे जाना और उन्होने मुझे बताया.
चलते चलते मैने उनसे उनका मेल आइ-डी मांग लिया, ताकि भविष्य में जरूरत पडने पर संपर्क कर सकूं.उन्होने जेब से अपना विजिटिंग कार्ड निकालते हुए मुझे दो आइ-डी बताये और बोले, ये ऊपर वाला हैदराबाद का, और नीचे वाला बैंगलोर का है,किसी पर भी सम्पर्क कर लेना... मैं भौंचक, कि ये क्या महिमा है, ये मेल आइ-डी है या पोस्ट बोक्स नम्बर?
फिर उन्होने समझाया कि उनका एक बेटा बैंगलोर में कार्यरत है और दूसरा हैदराबाद में ही, दोनो आइ-डी क्रमशः दोनो बेटों ने बना कर दिये है और वही इन्हें चेक करके खबर कर देते हैं...
मुझे बहुत हँसी भी आई और आश्चर्य भी हुआ था लेकिन उम्र और अनुभव में उनसे बहुत छोटा होने की वजह से उनसे कुछ कह नही पाया....बस उनसे विदा ली और आगे भी 'ई-मेल पर संपर्क में बने रहने' की बात कह कर चल आया.

Saturday, November 19, 2005

टिप्पणी.....?

अभी फुरसतिया जी की टिप्पणी-व्याख्या पढी, तो ये बात याद आ गयी.
हैदराबाद प्रवास के दौरान भोलाराम से मिलना हुआ जो अपने जीवन की कुछ बातें ब्लोग के माध्यम से व्यक्त करते हैं....वैसे भोलराम से हमार रिश्ता स्कूली दिनों से पहले है और एक ब्लोगर के रूप में बाद में...नवोदय विद्यालय पचपहाड में ये हमारे जूनियर थे...
काफी दिनों बाद मिलना हुआ... बातों बातों में मैने पूँछा, यार आजकल लिखते नही हो कुछ ब्लोग पर...तो बोले, लिखना तो चाहता हूँ पर टिप्पणियों से डरता हूँ, मैने पूँछा क्यों, तो पता चला कि अभी थोडे दिन पहले भोला के एक पोस्ट पर 'तेज रफ्तार लेन में गाडी चलाने वाले' अतुल जी ने करारी टिप्पणी कर दी थी, कि क्या ये अपनी रामकहानी लिखते रहते हो...कुछ "अच्छा" लिखो...तो बेचारे भोला घबरा गये...
खैर मैने उसे ढांढस बंधाया ..सो फिर बेचारा लिखने को तैयार हुआ है...अभी तक तो लिखा नही, देखते है, कब जागता है ;-)

Wednesday, November 16, 2005

वापसी

काफी दिनों बाद यहाँ लिखने का मौका मिला है...करीब एक सवा महीना हो गया...कैसे दिन बीते, पता ही नही चला..करीब एक महीने से फील्ड में था...लगभग ६००० किलोमीटर और चार राज्यों(झारखंड,उडीसा,आंध्रप्रदेश और छत्तीसगढ)का सफर...
अनगिनत लोगों से मिलना,तरह तरह का खान पान,बोल-चाल,खट्टे-मीठे-क़डुवे अनुभव...जब फील्ड में होते हैं तो रोज कुछ नया महसूस होता है,नया अनुभव होता है, इतना कुछ होता है वहाँ लिखने के लिये, लेकिन लिखने का मौका नही मिलता...और कालेज पहुँचने के बाद फिर जिन्दगी में एकरसता आ जाती है क्योकि वहां बँधा-बँधाया ढर्रा चलता है, और व्यस्तताएं इतनी होती हैं कि बस..
बाहर साइबर कैफे पर जाकर तो हिन्दी मेल भी नही पढ सकते(हर जगह '९८), लिखना तो दूर कि बात, सबसे पहले तो यूनिकोड फान्ट डालना पडता है...खैर अब सारी कसर निकालने की कोशिश करूंगा(लिखने और पढने दोनो की)
क़ल वापस उदयपुर पहुँचे है, अभी २-३ दिन गुजरात और जाना है, फिर रिपोर्ट बनानी है और फिर प्रस्तुतीकरण (presentation)उदयपुर और दिल्ली में...वापस IIFM पहुँचने तक ५ दिसम्बर हो ही जायेगी...

दिवाली इस बार बडी फीकी रही, हैदराबाद में था...कोई साथ नही था. स्कूल के बाद शायद पहली बार घर से बाहर दिवाली मनाई, और फिर उसके बाद अन्न्कूट का उत्सव...घर को बहुत 'मिस' किया...शायद वापसी में भोपाल लौटते समय घर होते हुए निकलूं