Sunday, May 28, 2006

हैदराबाद हिंदी ब्लागर मीट...

यह कोई बहुत बडी और बहुत योजनाबद्ध ब्लागरमीट नही थी,वैसे भी हैदराबाद से हिंदी में लिखने वाले बहुत कम दिखाई देते हैं...
तो हुआ यों कि हिंदी ब्लाग जगत में करीब ३ महीने पहले दस्तक देने वाले, और वर्तमान में काफी सक्रिय रूप से लिखने वाले (खासकर परिचर्चा में) सागर जी से करीब १५ दिन पहले जी-मेल पर बात हुई थी...उन्होने तत्काल ही घर आने का, उस दिन रात को साथ खाना खाने का और फिर रात को घर पर होने वाले जागरण में शामिल होने का निमंत्रण दे डाला था...पर उस समय नौकरी से फुरसत नही थी सो उनसे माफी मांग ली थी और पता ले लिया था...साथ ही यह भी कि अब किसी भी दिन घूमते-घामते आपके दर तक पहुंच जाऊंगा

तो कल दोपहर में भोजन के बाद ...इसी तरह घूमते हुए मैने अपने आप को सिकंदराबाद जाने वाली बस में पाया, वेस्ट मारदपल्ली जाने के लिये, जहां इनका सायबर केफे है...बस से उतर कर करीब आधे घंटे घूमते भटकते हुए, लोगों से रास्ता पूंछते हुए आखिर हम जा ही पहुंचे 'मकडियों के जाले' पर (अजी Spider, the WEB, जो इनके केफे का नाम है)

काफी गर्मजोशी से मिले..चाय पानी ठण्डा आदि कि पूंछताछ हुई, पानी मैने लिया पर चाय और ठंडे से हाथ जोड लिये...अभी तो खाना खाकर आया था...

काफी बातें हुई, ब्लाग के बारे में, परिचर्चा के बारे में,एक दूसरे के बारे में, घर परिवार के बारे में,हैदराबाद और सूरत और गुजरात(जहां ये पहले रहते थे)के बारे में, पंकज/संजय बैंगानी जी (इन लोगों से इनकी नियमित बात होती रहती है)के बारे में , राजनीति पर , धर्म पर और चूंकि हम दोनो ही राजस्थानी है, अतः राजस्थान भी कहीं न कहीं आ ही जाता था

सागर जी पहले भी लिखते रहें हैं..इनकी कुछ रचनाएं और विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित पत्र भी देखे

कहने लगे, परिचर्चा चलने के बाद से ब्लाग पे लिखना काफी कम हो गया है,चूंकि वहाँ गर्मा गरम बहस चलती रहती है, तो वहां लिखने में और मजा आता है....बोले पहले तो मैं सिर्फ ब्लाग पढा करता था, और सोंचता था कि ये लोग क्या लिखते रहते हैं, किंतु १-२ बार जीतू जी से टिप्पणियों का आदान प्रदान हुआ (और चूंकि ये एक मेल कि दूरी पर ही तो होते है) तो फिर खुद भी लिखने लगे, और अब क्या आलम है ये तो आप सब जानते ही हैं
पढने का और खासतौर से हिंदी पढने का काफी शौक है इन्हे...पर हैदराबाद में उपलब्धता नही हो पाती पुस्तकों की

करीब २ घंटे साथ बैठे.....
इस बीच यह भी देखा कि उसूलों के बडे पक्के हैं..अपने केफे में किसी को भी "उल्टी-सीधी" साइट नही खोलने देते...चाहे व्यापार पर बुरा असर पडे...

अब मुझे जाना था, सिकंदराबाद में ही स्थित गोवर्धन नाथ जी की हवेली पर, सो मैने उनसे विदा ली, इस बार मेरे फ्लेट/घर आने का निमंत्रणॅ दिया(साथ ही यह भी इशारा दे दिया कि अभी वहाँ बैठने लायक जगह भी नही है,ये सोंच कर आइयेगा )..पर अभी ये हमे कहाँ छोडने वाले थे, होटल पर ले जाकर चाय-नाश्ता हुआ और फिर स्कूटर से मेन रोड तक छोडा.

लौटते में मैं सोंच रहा था कि आज तक सुना था कि इंटरनेट से अन्जाने लोग मिलते है और दोस्त बन जाते हैं...आज मैने भी इसे अनुभव कर लिया....

Thursday, May 18, 2006

जो मैने देखा

अपनी पिछली पोस्ट में मैने मानव समाज में हो रहे परिवर्तन की गति पर चर्चा की थी... सौभाग्य से (या दुर्भाग्य से) मैं जिस काल खंड में बडा हुआ हूं उसमें ये परिवर्तन काफी तेजी से हो रहे हैं...

जब थोडा समझने लगा..करीब १०-११ साल की उम्र से...तब भारत आर्थिक उदारीकरण के युग में प्रवेश करने वाला था...और देखते देखते १५-१६ सालों में कितना कुछ बदल गया..

आज वो कुछ चीजें जो मेरे साथ बडी हुई और बदलीं...(मेरी लम्बाई,चश्मे के नम्बर, और दाढी-मूंछों के अलावा :) ) लगभग सभी बातें भारतीय समाज से ताल्लुक रखती हैं....मेरे हमउम्र और भी लोगों ने इन्हे महसूस किया होगा

मैने क्रिकेट को जुनून और सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान बनते देखा है

मैने शाहरुख खान को 'सर्कस'से निकल कर बॉलीवुड का 'बादशाह'बनते देखा है

मैने दूरदर्शन की साप्ताहिक फिल्म का बेसब्री से इंतजार किया है, और ५० चेनलों में भी कोई एक कार्यक्रम ठीक से ना देख पाने की बेबसी को भी महसूस किया है

मैने अपने घर फोन लगाने के लिये STD Booths पर ४-४ घन्टे बिताये है (हमेशा लाइन खराब मिलती थी) और मोबाइल से सुदूर गावों से घर पे बात की है

मैने Black & White TV को रंगीन मे बदलते देखा है

मैने अपने गांव में प्याऊ पर पानी भी पिलाया है, और एक बोतल पानी को १० रुपये में बिकते भी देखा है

मैने छोटे छोटे गांवों में पानी की किल्ल्त देखी है, पर वहां शराब का ठेका, या पेप्सी की दुकान भी देखी है

जब मेरे पिताजी ने मुझे पहली बार होस्टल में छोडा था, तो खर्च के लिये २० रुपये मिले थे, जो पूरे २ महीने चले, आज २० रुपये मे ठीक से नाश्ता भी नही कर पाता

प्रथम श्रेणी में पास होने पर लडकों को खुशी मनाते देखा है, तो कई अभिभावकों को अपने बच्चों को इस बात के लिये कोसते हुए सुना है कि उहे "सिर्फ" ८९% अंक ही क्यों मिले

मैने करगिल की विजय देखी है और कंधार कंड की त्रासदी झेली है

मैने डाकुओं को सांसद बनते देखा है, तो एक प्रोफेसर व वैज्ञानिक को देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होते देखा है

मैने गानों को छांट-छांट कर उनके केसेट भरवाये हैं, और पसंदीदा गाने Internet से सीधे लोड भी किये हैं

मैने चाचा चौधरी नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव को पढा है, तो हैरी पोटर और सुपरमेन भी देखे/पढे हैं

मैने अपने पापा को दूरदर्शन के शाम ८:३० वाले समाचार का इंतजार करते देखा है तो २४ घंटे खबरिया चैनलों की बकवास भी सुनी है

मैने 'रामायण' के समय सूनी सडके देखी है तो सास बहू के मिहिर के लिये लोगों को हल्ला करते भी देखा है

मैने 'सुरभी' के लिये लोगों को ६ रुपये का प्रतियोगिता पोस्टकार्ड भेजते देखा है तो इंडियन आइडल के लिये ६ रुपये का SMS भी भेजते देखा है

और भी बहुत कुछ है..अभी सब ध्यान नही आ रहा..आप भी बताइयेगा

Wednesday, May 10, 2006

परिवर्तन

परिवर्तन ही सतत है...Only Change is Constant..

यह बात कई जगहों पर कही और सुनी जाती है और लगभग हर पीढी,देश और काल के परिपेक्ष्य में सटीक भी बैठती है...लेकिन जो चीज़ ध्यान देने वाली है वो है परिवर्तन की दर...The rate of Change...जिस गति से परिवर्तन हो रहे हैं, क्या मानव उसके लिये तैयार है?

एल्विन टॉफ्लर अपनी पुस्तक त्रयी Future Shock, Power Shift और Third Wave में इस बात को बखूबी इंगित करते हैं...

जरा सोंचिये...ज्यादा दूर न जाकर सिर्फ पिछले २ हज़ार सालों का इतिहास उठाते हैं...करीब १६०० इस्वी तक मानव समाज पूर्णतः कृषि आधारित था...अगले मात्र ३०० सालों में औद्यौगिक क्रांति ने पूरे विश्व में पैर पसार लिये. कृषि आधारित समाज को उद्योग आधरित समाज बनने में मात्र ३०० साल...??
अगर मानव उत्पत्ति का इतिहास देखा जाये,तो ३०० साल मानव जाति के तो संपूर्ण इतिहास के लिये एक पल के बराबर भी नहीं हैं...

इसकी तुलना किजिये इस बात से,कि जब मानव अपने वर्तमान स्वरूप में आया (होमो सेपियन्स, जो सीधा चल सकते थे....सोंच सकते थे..आदि आदि)..तो उसे लाखो वर्ष खानाबदोश से कृषि आधारित समाज बनने में लगे...कृषि आधारित समाज भी कई हजार वर्ष तक चलता रहा...लेकिन कृषि से उद्योग की दूरी सिर्फ ३००-४०० साल में...????

और अब आइये वर्तमान युग में और इसी चीज की तुलना कीजिये पिछले ५० वर्ष में हुए बदलाव से...हम Industrial Revlution को पीछे छोड कर Information Revolution में प्रवेश कर रहे हैं...जिसका कि उदाहरण ये कम्प्यूटर, इन्टरनेट और मोबाइल क्रांति है और अगर बदलाव की यही दर रही तो सोंचिये अगले २० वर्ष हमें कहाँ से कहाँ ले जाने वाले हैं?

सूचना क्रांति की बाद कौन सी क्रांति होगी...Genetic?...Biotech...?और क्या इन परिवर्तनों के लिये मानव(शरीर एवं समाज दोनो)..मानसिक, भौतिक और जैविक रूप से तैयार है?

सोंचिये....सोंचते समय ये भी सोंचियेगा कि २० साल पहले आप आज याने वर्तमान(उस समय का भविष्य) के बारे में क्या सोंचते थे?.(बशर्ते कि आप की उम्र २० साल से ज्यादा हो और २० साल पहले आपने अगले २० साल के बारे में सोंचा हो..:))

सोंचिये...मानव समाज अगले २० साल में कहाँ होगा, प्राथमिकताएं क्या होगी...और तकनीक...वो हमें क्या क्या दिखा सकती है..क्या क्या गुल खिला सकती है? जरा सोंचिये...

और हाँ , अगर आप पढने के शौकीन हैं और आपने टॉफ्लर की उक्त पुस्तकें नही पढी हैं...तो अवश्य पढियेगा...दिमाग की खिडकियाँ खोल देती हैं...(Soft Copy भी मिल जायेगी)

Monday, May 08, 2006

रफ्तार की गहराई

अभी कुछ दिन पहले इन्टरनेट पर हिन्दी के प्रचार प्रसार में आने वाली समस्याओं पर एक लेख पढा था, हिन्दी सर्च इंजन के बारे में भी वहाँ कुछ लिखा था, और रफ्तार के बारे में भी...रफ्तार के बारे में बहुत दिन पहले सुना था पर उसे आजमाया नही था...इस लेख को पढ कर सोंचा कि क्यों ना आजमाया जाये...पर नतीजा बडा कष्टप्रद निकला...

सबसे पहले हमने हमारा नाम वहाँ डाल कर देखा , गूगल महोदय हमारे नाम को लेकर करीब ३०० परिणाम बताते हैं, जिनमे सबसे पहले हमारा ब्लोग आता है, रफ्तार की रफ्तार सिर्फ ४० तक ही पहुँच पाई :(...बहुत दुखः हुआ, फिर सोंचा कि हम तो आम जनता हैं, हमारा नाम इतना महत्वपूर्ण भी नही है, शायद रफ्तार ने शामिल करना ही उचित नही समझा हो, तो 'भारत' को लेकर यही प्रयोग आजमाया... भारत शब्द को लेकर रफ्तार कुछ १८००० परिणाम दिखाता है, यही शब्द जब मै गूगल महोदय के पास लेकर गया तो उन्होने ९,९२,००० परिणाम दिखाये...याने ५० गुना फर्क !!!

दिल तो बहुत दुखा, पर कुछ कर नही सकते थे...सोंचा के क्यों न थोडी समाज सेवा की जाये, मुख पृष्ठ पर नीचे एक लिंक थी, 'हिन्दी वेब साइट बताएं'..हमने सोंचा कि अपना ब्लोग तो यहाँ डाल ही देते हैं, हिन्दी का कुछ तो भला होगा, पर जब यहाँ भी आगे बढे तो ऐसे ऐसे सवाल दागे गये, कि हमने भाग छूटने में ही अपनी भलाई समझी...मसलन्.....फॉन्ट का नाम, फॉन्ट का परिवार(Family)..और यहाँ तक कि उसका चरित्र (बोले तो, font character ;))...पूँछ डाला, अब भाई हम तो सीधे सीधे हिन्दिनी के हग टूल पर टाइप करके चिपका देते है, ये नाम, पता, परिवार और चाल चलन हम कहाँ से बताएं, सो फ्रस्टा कर हमने रफ्तार पर ब्रेक लगाये, गूगल जिन्दाबाद बोला और ये ब्लोग लिखने बैठ गये....

Tuesday, May 02, 2006

अपने अपने फर्ज

विदेशों में स्वेच्छा से पैसा कमाने गये भारतीयों की सुरक्षा का जिम्मा सरकार ले या ना ले, इस पर काफी बहस चल रही है...नुक्ताचीनी में इस पर लेख लिखा गया, युगल ने अपने चिट्ठे में इस पर एक सवाल छोडा, और हिन्दिनी पर भी इस बारे में चर्चा हुई..

मैं कुछ प्रश्न उठाना चाहूंगा...

जब कोई भारतीय(या अनिवासी भरतीय)विदेश नें जाकर नाम और शोहरत कमाता है, तो क्या हम अपने गाल बजाकर खुश नही होते?

क्या हम बाहर जाकर बसे भारतीय से यह अपेक्षा नही करते कि वो भारत में निवेश करे, भारत कि उन्नति में योगदान दे...?

क्यों हम बडे बडे सम्मेलन आयोजित करते हैं जिनमें बाहर जाकर बसे भारतीयों से देश की तरक्की में हाथ बंटाने की अपील की जाती है?

अब अगर देश यह उम्मीद रखता है, कि देश का नागरिक(या अनिवासी नागरिक), देश के प्रति अपना फर्ज समझे, तो क्या फिर देश और सरकार का यह फर्ज नही है कि उन्ही नागरिकों की सुरक्षा और हिफाजत के लिये वो दुनिया की किसी भी ताकत टकरा जाये और इतना कडा और कूटनीतिक रुख अख्तियार करे कि आगे कोई इस तरह की हरकत करने की हिमाकत ना करे ?

क्या हमारी आज की स्थिति पूर्व में की गयी कूटनीतिक भूलों का परिणाम नही है? अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इन भूलों को दुहराएं और आने वाली पीढियों को भी परेशान करे, या फिर इनमें सुधार करने का प्रयत्न करें?