tag:blogger.com,1999:blog-143387162008-04-01T02:31:31.129-07:00इन्द्रधनुषNitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comBlogger49125tag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1154008639760727522006-07-27T06:51:00.000-07:002006-07-27T06:57:19.773-07:00पता परिवर्तन सूचनासभी खास-ओ-आम को सूचित किया जाता है कि अपनी दुकान नई जगह शिफ़्ट हो गई है...नया पता <a href="http://www.saptrang.wordpress.com">ये रहा....</a>सिर्फ़ एक क्लिक की दूरी पर..:)<br />ये दुकान भी चलती रहेगी..पर हो सकता है माल यहां तक पहुंचने में कभी कभी वक्त लग जाये...<br />नारद जी को अलग से चिट्ठी लिख कर सूचित कर दिया गया है..<br />जब भी वक्त मिले...पधारियेगा...हम भी कोशिश करेंगे कि दुकान नियमित रूप से चलती/खुलती रहे और वहां माल की आपूर्ती बनी रहे..<br />सधन्यवादNitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1153149582244703732006-07-17T08:07:00.000-07:002006-07-17T08:19:42.300-07:00२१ वीं अनुगूंज - चुटकुले<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/1617/506/1600/anugunj.jpg"><img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/1617/506/320/anugunj.jpg" border="0" /></a><br />हर सफ़ल पुरुष के पीछे एक महिला का योगदान होता है<br />हर असफ़ल पुरुष ले पीछे....कई महिलाओं का<br /><br />*****************************************************<br /><br />अगर आपके पिताजी गरीब हैं तो ये आपकी बदकिस्मती है,<br />अगर आपके ससुर गरीब हैं तो ये आपकी बेवकूफ़ी है.<br /><br />*****************************************************<br /><br />आपका भविष्य आपके सपनों पर निर्भर करता है.<br />ठीक है..मैं चला सोने.<br /><br />*****************************************************<br /><br />खुदी को कर बुलन्द इतना और इतनी ऊंचाई पर पहुंच जा,<br />कि खुदा खुद तुझ से पूंछे.....<br />अबे गधे, नीचे कैसे उतरेगा...<br /><br />******************************************************<br /><br />खिडकी खुली, जुल्फ़ें बिखरी,<br />दिल ने कहा दिलदार निकला.<br />पर हाय रे मेरी फ़ूटी किस्मत,<br />नहाया हुआ सरदार निकला.<br /><br />******************************************************<br /><br />कहते हैं, इश्क में नींद उड जाती है.<br />कोई हमसे भी इश्क कर ले.......<br />कम्बख्त नींद बहुत आती है<br /><br />*******************************************************<br /><br />जिन्दगी में तुम बहुत आगे जाओगे.<br />क्योंकि जहां भी तुम जाओगे,लोग कहेंगे...<br />चल बे,आगे चल.<br /><br />*******************************************************<br /><br />घडी बिगड्ती है तो बन्द हो जाती है,<br />लडकी बिगडे तो चालू हो जाती है.<br /><br />*******************************************************<br /><br />अटल जी जनसंख्या समस्या पर भाषण दे रहे थे,<br />भाषण में परिवार नियोजन जैसे उपाय अपनाने पर भी जोर दे रहे थे.<br />लालू जी पीछे बैठे बहुत देर तक सुनते रहे...आखिरकार उनसे रहा नही गया,<br />बोले:"अटल जी,आप चुप रहिये. बडे बुजुर्ग कह गये हैं, जिस काम का अनुभव नही हो, उसके बारे में बोलना भी नही चाहिये."Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1152541867728972212006-07-10T06:49:00.000-07:002006-07-10T07:31:07.860-07:00अपना भी एक साल पूरा !!!अभी अभी ध्यान गया कि कल, ९ जुलाई २००६ को हमारे इस चिट्ठे ने भी अपनी उम्र का एक वर्ष पूरा कर लिया.<br /><br />जैसी कि रीत है, इस अवसर पर पुनरावलोकन करने की कोशिश की जाती है, तो पहली और महत्वपूर्ण बात तो ये कि इस एक वर्ष में काफ़ी कुछ सीखा. थोडा बहुत लिखा, और सबसे रसभरी बात, काफ़ी कुछ पढने को मिला.<br /><br />दूसरी बात ये कि चिट्ठों के माध्यम से काफ़ी लोगों को जाना, काफ़ी मित्र बने. <a href="http://sagarnahar.blogspot.com">सागर जी</a> से कुछ ही दिन पहले सक्षात भी मिल लिये....सही मायनों में पहली बार महसूस किया कि अंतरजाल नये लोगों को मिलाता है.हमारे सहकर्मी <a href="http://www.hemnathan.blogspot.com">हेमनाथन </a>से भी हमारा पहला परिचय ब्लोग(अंग्रेजी वाले) के माध्यम से ही हुआ था.<br /><br />लिखने की शुरुआत हमने कुछ कविताओं से की थी, लेकिन धीरे धीरे अपनी <strong>बकर</strong> की भडास भी यहीं निकालने लगे. वैसे लिखने में हमने कोई तीर नही मारे, लेकिन एक बात है कि चिट्ठा लेखन से हमारे सोंचने के तरीके में बदलाव जरूर आया (वैसे सोंचते हम पहले भी थे)..पर अब एक आदत ये हो गई है कि किसी भी घटना-दुर्घटना को देखते हैं तो उसके २-३ पहलू देख लेते हैं..और ये जरूर सोंचते हैं कि क्या इस बात को अपने चिट्ठे पर डाला जा सकता है...यदि हां तो कैसे(ये अलग बात है कि अक्सर ये खयाल ही होते हैं...आखिर हम ठहरे घोर आलसी)<br /><br />खुशी की बात ये भी है कि इस दौर में हिन्दी का प्रसार नेट पर जोरशोर से चलता रहा, हिन्दी चिट्ठों का आंकडा करीबन ५० से २०० के ऊपर पहुंच गया. हमें खुशी है कि ना सिर्फ़ हम इस प्रगति के साक्षी रहे, बल्कि कुछ हद तक इसमें भागीदार भी रहे :)<br /><br />एक दुख यह कि हिन्दी लिखने के बाद अपने अंग्रेजी चिट्ठे पर लिखना लगभग छूट गया. क्या करें, जब लिखने की इच्छा होती है, और हिन्दी लिखने का विकल्प सामने होता है तो अंग्रेजी लिखने की इच्छा ही नही होती. कई बार सोंच चुका वहां लिखने की, पर दिल की दिल में ही रह गई...<br /><br />और हां...नियमित लेखन..इस बारे में भी हम कई बार ठान चुके हैं कि नियमित रूप से लिखेंगे...(चाहे वो दैनिक हो या साप्ताहिक या पाक्षिक )...पर हाय रे आलस्य...आराम बडी चीज है..:)<br /><br />सौभाग्यवश इस पूरे साल में लगभग नियमित रूप से नेट कनेक्शन हमें मिलता रहा, जिसके चलते ये सब ऐश अपने चलते रहे...देखते हैं आगे कब तक ये चल पायेगाNitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1151994466850958602006-07-03T22:29:00.000-07:002006-07-03T23:27:46.933-07:00किरकिट पर कुछ........भारत ने वेस्टइंडीज में आखिरकार ३५ साल बाद सीरिज जीत ही ली....अनिल कुंबले ने २३ विकेट लेकर एक बार फ़िर साबित किया कि वे अभी भी भारतीय टीम की जान हैं...और द्रविड के बारे में तो कुछ कहने की जरूरत ही नही....a true leader....leading by example....मुझे आश्चर्य नही होगा अगर जल्द ही कोई Management School द्रविड को लेकर Leadership पर कोई Case Study बना दे...<br /><br />भारतीय टीम को शुभकामनाएं...वैसे सीरिज की विजय फ़ुटबाल के हो-हल्ले में दब कर रह गई....और इतनी चर्चा इसे शायद नही मिली जितनी अन्यथा मिलती...<br /><br />खैर, इस लेख को लिखने का मेरा मंतव्य सिर्फ़ शुभकामना देना भर नही था....कुछ और बात थी जिसने मेरा ध्यान खींचा ....भारतीय टीम का विदेशी धरती पर जीत का अकाल वैसे तो हमेशा चर्चा का मुद्दा रहता था...लेकिन आज मैने रेडिफ़ पर अब तक की भारतीय जीतों(उपमहाद्वीप के बाहर) की <a href="http://in.rediff.com/cricket/2006/jul/03stats.htm">सूची </a>देखी....<br />अब तक भारत ने उपमहाद्वीप के बाहर १९ टेस्ट जीते हैं.....<br /><br />मौटे तौर पर अगर में इन विजयों को समय के हिसाब से बांटूं तो वो इस तरह की तस्वीर दिखाती है<br /><br />सन ६५ से ७५ (१० साल) - ७ टेस्ट (३७ %)<br />सन ७५ से ८६ (११ साल) - ५ टेस्ट (२६ %)<br />सन २००० से संप्रति (०६ साल) -७ टेस्ट (३७ %)<br /><br />अब सिर्फ़ इस मोटे आंकडे को लेकर कुछ मुद्दे/सवाल/विचार.....<br /><br />क्या यह माना जाए कि सन २००० के बाद भारतीय क्रिकेट की स्थिति मजबूत हुई है ?....गौर कीजिये कि इसी दौर में भारत ने आस्ट्रेलिया को उसी की धरती पर हराया, विश्वकप फ़ाइनल मे पहुंचे, जिम्बावे और वेस्टइंडीज में सीरिज जीती....<br />और हां एक आक्रामक कप्तान, सौरव गांगुली, विदेशी कोच (जिनका की वरिष्ठ भारतीय खिलाडी हमेशा विरोध करते थे) और कई नये व युवा खिलाडी....<br /><br />दूसरी बात यह कि क्या कारण थे कि ८६ से २०००..करीब १५ साल जीत का अकाल रहा...ध्यान दें कि यही वह समय था, जब कि क्रिकेट ने भारत के कोने कोने में पैर पसारे....क्रिकेट धर्म बन गया...यह वह समय रहा जब क्रिकेट का जादू पूरे देश में सर चढ कर बोलने लगा...फ़िर ऐसा क्यों हुआ कि इसी काल में भारत उपमहाद्वीप के बाहर एक जीत को तरस गया....<br /><br />कुछ कारण जो मेरी समझ में आते हैं...<br /><br />क्रिकेट का जो जादू था, उसका कारण एक-दिनी क्रिकेट रहा..ना कि टेस्ट...इसी वजह से टेस्ट क्रिकेट हाशिये पर पहुंच गया....खिलाडियों के लिये भी, जनता के लिये भी और कर्ता-धर्ताओं के लिये भी...(यहां यह बात कहना चाहूंगा कि पिछले ८-१० साल में टेस्ट का रोमांच फ़िर पैदा हुआ है..श्रेय दूंगा स्टीव वा की आस्ट्रेलियाई टीम को...पोन्टिंग उसी परम्परा को आगे बढा रहे हैं...)<br /><br />क्रिकेट में पैसे का बोलबाला हो गया...खिलाडियों के लिये प्राथमिकताएं खेल से हट कर विग्यापनों पर आ गई.....और खिलाडी Larger then Life हो गये....(इसी दौर में हमें सचिन तेंदुलकर मिले...पर हां, करीबन सन २००० के बाद से ही वे चोटों की वजह से मैदान के अंदर-बाहर होते रहे है)<br /><br />जब क्रिकेट में पैसा आया...तो राजनीति भी घुस गई...राजनीति जहां घुस जाये वहां क्या होता है..उससे हर हिंदुस्तानी अच्छी तरह परिचित है....ऐसे लोग व्यवस्था संभाल रहे थे/हैं जिन्होने कभी स्कूल में भी बल्ला नही पकडा होगा....और हां..आरक्षण(कुछ ऐसा होता था शायद कि फ़लां क्षेत्र से इतने खिलाडी तो होने ही चाहिये...)..गनीमत है कि अभी तक आरक्षण के अन्य आधार क्रिकेटियों ने इजाद नही किये...<br /><br />सट्टेबाजी को यहां लिखूं या नही..ये मैं निश्चित नही कर पा रहा..क्योंकि मेरे हिसाब में ये तो फ़टाफ़ट क्रिकेट में और ज्यादा थी/है(?)...<br /><br />और कोई कारण आपकी नजर में आये तो बताइयेगा....<br /><br />सन ८५ से पहले के हालात पर कुछ लिख नही रहा हूं..क्योकि क्रिकेट का इतना इतिहास अभी तक मैने विस्तार में पढा नही है....८५ के बाद तो लगभग सब अपने सामने हुआ है :)...कोई रोशनी/प्रकाश डाल सकें तो खुशी होगी...Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1151401101531697632006-06-27T02:32:00.000-07:002006-06-27T02:38:21.546-07:00....कारवाँ बनता गया.नारद के <a href="http://akshargram.com/narad/archives/">पुरालेख </a>वाले हिस्से पर नजर डालेंगे तो पायेंगे कि २००६ में अभी तक हिंदी चिट्ठों पर करीब 3000 प्रविष्टियाँ लिखी जा चुकी हैं...खुशी की बात यह है कि २००५ के पूरे साल में जितना लिखा गया था, उससे ज्यादा २००६ की पहली छमाही में ही छाप दिया गया,(यह संख्या सिर्फ उन चिट्ठों की है जिनकी खबर नारद को है...वास्तविकता में यह इससे काफी ज्यादा हो सकती है) और यह सही मायनों में हिन्दी ब्लागमंडल(और अन्तर्जाल)पर हिन्दी के प्रसार का द्योतक है...आशा करते हैं कि २००६ की दूसरी छमाही में हम इससे भी दुगुना-तिगुना-चौगुना लिखेंगे...<br /><br />साथ ही मैं यह भी आशा करता हूँ कि आने वाले समय में हिन्दी चिट्ठों में विविधता बढती जायेगी....जो कि इन्हे समृद्ध बनाने के लिये काफी जरूरी है...करीब साल भर पहले तक अधिकतर चिट्ठे साहित्यिक हुआ करते थे...मैने खुद अपने चिट्ठे की शुरुआत अपने कुछ कविताओं से की थी...जिन्हे कोई नही पढता था...लेकिन अब काफी बदलाव आ रहा है साहित्यिक के साथ <a href="http://hi.shunya.in/">तकनीकी</a> <a href="http://www.tarakash.com/pathshala/">ज्ञान </a>, <a href="http://www.neerajdiwan.blogspot.com/">खबरी</a>, <a href="http://srimadbhagvadgita.blogspot.com/">धार्मिक </a>चिट्ठे भी दिखाई दे रहे हैं...हाँ टोने-टोटके की आलोचना और इसके बंद किये जाने का मुझे दुख हुआ...<br /><br /><a href="http://www.akshargram.com/paricharcha">परिचर्चा </a>के आने से लोगों के बीच संवाद भी बढा है..हाँ इसका चिट्ठाकारी पर क्या असर पडेगा ये देखना होगा...क्योंकि कम से कम एक ऐसे चिट्ठाकार को तो मैं जानता हूं, जिन्होने परिचर्चा शुरु होने के बाद से चिट्ठे पर लिखना कम कर दिया है(और इस बात को स्वीकार भी किया है)...बाकि लोगों के क्या हाल है कृपया अवगत कराएं<br /><br />एक और विचारणीय तथ्य...कई पुराने चिट्ठों के शटर डाउन हो चुके हैं...उम्मीद है कि वे पुनर्जीवित होंगे और फिर से लिखना शुरू करेंगे...Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1151318208752908772006-06-26T03:35:00.000-07:002006-06-26T03:36:48.763-07:00राकेश रोशन की फिल्मेंरितिक/राकेश रोशन की नई फिल्म "कृष" के काफी अच्छी से लेकर बहुत खराब समीक्षाएं सुन/पढ चुका हूं..अभी देखी नही है सो अपनी राय तो नही दे सकता, लेकिन राकेश रोशन निर्देशित फिल्मों(पिछली ४-५)को देखें..और जरा गौर करें तो पायेंगे कि कुछ आधारभूत बातें उनकी हर फिल्म में एक जैसी होंगी..जैसे<br />फिल्म के पहले आधे भाग में हीरो बिल्कुल सीधा साधा होगा...हीरो-हीरोइन मिलेंगे..इश्क-विश्क होगा, गाने गाये जायेंगे...और आप सोंचेंगे...."ये कहाँ आ गये हम..."<br />मध्यांतर के ठीक पहले, फिल्म में एक अच्छा सा पेंच (twist) दे दिया जायेगा..और यहाँ से फिल्म एकदम रोमांचक मोड ले लेगी..अर दर्शक फिल्म से बंधा हुआ रह जायेगा..<br />अच्छे गाने/लोकेशन्स/हीरो/हीरोइन तो लगभग हर निर्देशक उपलब्ध करा लेता है, लेकिन आजकल की लगभग सारी फिल्मों में और खासकर रोमांच फिल्मों में सबसे बडी समस्या यहीं आती है, कि पहले हाफ में तो फिल्म ठीक ठाक चलती है,लेकिन मध्यांतर के बाद निर्देशक फिल्म पर अपनी पकड खो देता है...और अंत आते आते तो ऐसा लगता है कि जबरन फिल्म को खत्म किया जा रहा है...<br />अगर कोई निर्देशक फिल्मे के दूसरे भाग पर पकड मजबूत रखे...तो सफलता की संभावना भी बढ जाती है...Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1149570523366667732006-06-05T22:04:00.000-07:002006-06-06T01:35:40.373-07:00सुर्खियों से हट करआज आरक्षण,महाजन,आमिर खान,लाभ का पद,क्रिकेट इत्यादि के अलावा कुछ बातें...<br /><br />क्या आपको गेहूँ के भाव पता हैं?....<br />पिछले कुछ दिनों(महीनों)से १० रुपये प्रति किलो से १८-२० रुपये प्रति किलो तक चल रहे हैं<br />सरकार देश के किसानों से ७ रुपये किलो गेहूँ खरीद रही है, और दूसरे देशों से १० रुपये किलो तक में आयत कर रही है<br />उडद मूँग चना तुवर आदि दालों के भाव ४६ से ६० रुपये प्रति किलो जा पहुँचे हैं..<br />शकर २०-२१ रुपये किलो हो गई है<br />सब्जियों के दाम भी कमोबेश आसमान छू रहे हैं (वैसे मैने बहुत दिन से खरीदी नही)<br />चांदी १८-१९००० रुपये प्रति किलो....साल डेढ साल पहले तक ८-१० हजार रुपये प्रति किलो थी<br />सोना ९-९५०० रुपये प्रति दस ग्राम...साल डेढ साल पहले तक ६-७००० रुपये प्रति दस ग्राम था<br />रेलवे स्टेशनों पर सार्वजनिक नलों में पानी नही मिलता हर जगह् बोतलबंद पानी जो उपलब्ध है... पेट्रोल और डीजल के दाम के बारे में कुछ ना कहना ही बेहतर है....अभी कल ही फिर बढा दिये...<br />शहरों में और महानगरों में एक आम आदमी के लिये अपना एक घर खरीद पाना असंभव सा हो गया है<br /><br />अभी कुछ समय पहले सुनील जी ने सपनों पर एक <a href="http://www.kalpana.it/hindi/blog/2006/05/blog-post_18.html">लेख </a>लिखा था...आप बताइये कोई कैसे करेगा अपने सपने पूरे जब रोटी, कपडा और मकान जैसी मूलभूत सुविधाएं ही आम इंसान के लिये मुश्किल हो रही है.६० रुपये की न्यूनतम मजदूरी तो छोडिये, क्या १००-१२५ रुपये रोज कमाने वाला एक आदमी भी इस महँगाई में ४ लोगों के परिवार का खर्च ठीक से चला सकता है?<br />सपनों के ऊपर आगे और लिखूंगा, लेकिन यह तो सोंचने की बात है ही कि हमारे अखबार पत्रिकाएं और न्यूज चैनल इन सब खबरों को अपनी सुर्खियाँ क्यों नही बन्नते, जबकि ये खबरें आम आदमी से सबसे ज्यादा सरोकार रखती हैं...Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1148802734978668962006-05-28T00:43:00.000-07:002006-05-28T00:52:14.990-07:00हैदराबाद हिंदी ब्लागर मीट...यह कोई बहुत बडी और बहुत योजनाबद्ध ब्लागरमीट नही थी,वैसे भी हैदराबाद से हिंदी में लिखने वाले बहुत कम दिखाई देते हैं...<br />तो हुआ यों कि हिंदी ब्लाग जगत में करीब ३ महीने पहले <a href="http://sagarnahar.blogspot.com/">दस्तक </a>देने वाले, और वर्तमान में काफी सक्रिय रूप से लिखने वाले (खासकर <a href="http://www.akshargram.com/paricharcha">परिचर्चा </a>में) सागर जी से करीब १५ दिन पहले जी-मेल पर बात हुई थी...उन्होने तत्काल ही घर आने का, उस दिन रात को साथ खाना खाने का और फिर रात को घर पर होने वाले जागरण में शामिल होने का निमंत्रण दे डाला था...पर उस समय नौकरी से फुरसत नही थी सो उनसे माफी मांग ली थी और पता ले लिया था...साथ ही यह भी कि अब किसी भी दिन घूमते-घामते आपके दर तक पहुंच जाऊंगा<br /><br />तो कल दोपहर में भोजन के बाद ...इसी तरह घूमते हुए मैने अपने आप को सिकंदराबाद जाने वाली बस में पाया, वेस्ट मारदपल्ली जाने के लिये, जहां इनका सायबर केफे है...बस से उतर कर करीब आधे घंटे घूमते भटकते हुए, लोगों से रास्ता पूंछते हुए आखिर हम जा ही पहुंचे 'मकडियों के जाले' पर (अजी Spider, the WEB, जो इनके केफे का नाम है)<br /><br />काफी गर्मजोशी से मिले..चाय पानी ठण्डा आदि कि पूंछताछ हुई, पानी मैने लिया पर चाय और ठंडे से हाथ जोड लिये...अभी तो खाना खाकर आया था...<br /><br />काफी बातें हुई, ब्लाग के बारे में, परिचर्चा के बारे में,एक दूसरे के बारे में, घर परिवार के बारे में,हैदराबाद और सूरत और गुजरात(जहां ये पहले रहते थे)के बारे में, <a href="http://www.tarakash.com">पंकज/संजय बैंगानी </a>जी (इन लोगों से इनकी नियमित बात होती रहती है)के बारे में , राजनीति पर , धर्म पर और चूंकि हम दोनो ही राजस्थानी है, अतः राजस्थान भी कहीं न कहीं आ ही जाता था<br /><br />सागर जी पहले भी लिखते रहें हैं..इनकी कुछ रचनाएं और विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित पत्र भी देखे<br /><br />कहने लगे, <a href="http://www.akshargram.com/paricharcha">परिचर्चा </a>चलने के बाद से ब्लाग पे लिखना काफी कम हो गया है,चूंकि वहाँ गर्मा गरम बहस चलती रहती है, तो वहां लिखने में और मजा आता है....बोले पहले तो मैं सिर्फ ब्लाग पढा करता था, और सोंचता था कि ये लोग क्या लिखते रहते हैं, किंतु १-२ बार <a href="http://www.jitu.info/merapanna/">जीतू जी</a> से टिप्पणियों का आदान प्रदान हुआ (और चूंकि ये एक मेल कि दूरी पर ही तो होते है) तो फिर खुद भी लिखने लगे, और अब क्या आलम है ये तो आप सब जानते ही हैं<br />पढने का और खासतौर से हिंदी पढने का काफी शौक है इन्हे...पर हैदराबाद में उपलब्धता नही हो पाती पुस्तकों की<br /><br />करीब २ घंटे साथ बैठे.....<br />इस बीच यह भी देखा कि उसूलों के बडे पक्के हैं..अपने केफे में किसी को भी <strong>"उल्टी-सीधी"</strong> साइट नही खोलने देते...चाहे व्यापार पर बुरा असर पडे...<br /><br />अब मुझे जाना था, सिकंदराबाद में ही स्थित गोवर्धन नाथ जी की हवेली पर, सो मैने उनसे विदा ली, इस बार मेरे फ्लेट/घर आने का निमंत्रणॅ दिया(साथ ही यह भी इशारा दे दिया कि अभी वहाँ बैठने लायक जगह भी नही है,ये सोंच कर आइयेगा )..पर अभी ये हमे कहाँ छोडने वाले थे, होटल पर ले जाकर चाय-नाश्ता हुआ और फिर स्कूटर से मेन रोड तक छोडा.<br /><br />लौटते में मैं सोंच रहा था कि आज तक सुना था कि इंटरनेट से अन्जाने लोग मिलते है और दोस्त बन जाते हैं...आज मैने भी इसे अनुभव कर लिया....Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1147951446340692282006-05-18T04:21:00.000-07:002006-05-18T04:24:06.343-07:00जो मैने देखा<span style="font-family:trebuchet ms;">अपनी </span><a href="http://saptrang.blogspot.com/2006/05/blog-post_10.html"><span style="font-family:trebuchet ms;">पिछली पोस्ट </span></a><span style="font-family:trebuchet ms;">में मैने मानव समाज में हो रहे परिवर्तन की गति पर चर्चा की थी... सौभाग्य से (या दुर्भाग्य से) मैं जिस काल खंड में बडा हुआ हूं उसमें ये परिवर्तन काफी तेजी से हो रहे हैं... </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">जब थोडा समझने लगा..करीब १०-११ साल की उम्र से...तब भारत आर्थिक उदारीकरण के युग में प्रवेश करने वाला था...और देखते देखते १५-१६ सालों में कितना कुछ बदल गया.. </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">आज वो कुछ चीजें जो मेरे साथ बडी हुई और बदलीं...(मेरी लम्बाई,चश्मे के नम्बर, और दाढी-मूंछों के अलावा :) ) लगभग सभी बातें भारतीय समाज से ताल्लुक रखती हैं....मेरे हमउम्र और भी लोगों ने इन्हे महसूस किया होगा </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने क्रिकेट को जुनून और सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान बनते देखा है </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने शाहरुख खान को 'सर्कस'से निकल कर बॉलीवुड का 'बादशाह'बनते देखा है </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने दूरदर्शन की साप्ताहिक फिल्म का बेसब्री से इंतजार किया है, और ५० चेनलों में भी कोई एक कार्यक्रम ठीक से ना देख पाने की बेबसी को भी महसूस किया है </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने अपने घर फोन लगाने के लिये STD Booths पर ४-४ घन्टे बिताये है (हमेशा लाइन खराब मिलती थी) और मोबाइल से सुदूर गावों से घर पे बात की है </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने Black & White TV को रंगीन मे बदलते देखा है </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने अपने गांव में प्याऊ पर पानी भी पिलाया है, और एक बोतल पानी को १० रुपये में बिकते भी देखा है </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने छोटे छोटे गांवों में पानी की किल्ल्त देखी है, पर वहां शराब का ठेका, या पेप्सी की दुकान भी देखी है </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">जब मेरे पिताजी ने मुझे पहली बार होस्टल में छोडा था, तो खर्च के लिये २० रुपये मिले थे, जो पूरे २ महीने चले, आज २० रुपये मे ठीक से नाश्ता भी नही कर पाता </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">प्रथम श्रेणी में पास होने पर लडकों को खुशी मनाते देखा है, तो कई अभिभावकों को अपने बच्चों को इस बात के लिये कोसते हुए सुना है कि उहे "सिर्फ" ८९% अंक ही क्यों मिले </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने करगिल की विजय देखी है और कंधार कंड की त्रासदी झेली है </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने डाकुओं को सांसद बनते देखा है, तो एक प्रोफेसर व वैज्ञानिक को देश के सर्वोच्च पद पर आसीन होते देखा है </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने गानों को छांट-छांट कर उनके केसेट भरवाये हैं, और पसंदीदा गाने Internet से सीधे लोड भी किये हैं </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने चाचा चौधरी नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव को पढा है, तो हैरी पोटर और सुपरमेन भी देखे/पढे हैं</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने अपने पापा को दूरदर्शन के शाम ८:३० वाले समाचार का इंतजार करते देखा है तो २४ घंटे खबरिया चैनलों की बकवास भी सुनी है </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने 'रामायण' के समय सूनी सडके देखी है तो सास बहू के मिहिर के लिये लोगों को हल्ला करते भी देखा है </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने 'सुरभी' के लिये लोगों को ६ रुपये का प्रतियोगिता पोस्टकार्ड भेजते देखा है तो इंडियन आइडल के लिये ६ रुपये का SMS भी भेजते देखा है </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">और भी बहुत कुछ है..अभी सब ध्यान नही आ रहा..आप भी बताइयेगा</span>Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1147246940559790242006-05-10T00:40:00.000-07:002006-05-10T01:55:13.093-07:00परिवर्तनपरिवर्तन ही सतत है...Only Change is Constant..<br /><br />यह बात कई जगहों पर कही और सुनी जाती है और लगभग हर पीढी,देश और काल के परिपेक्ष्य में सटीक भी बैठती है...लेकिन जो चीज़ ध्यान देने वाली है वो है परिवर्तन की दर...The rate of Change...जिस गति से परिवर्तन हो रहे हैं, क्या मानव उसके लिये तैयार है?<br /><br /><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Alvin_Toffler">एल्विन टॉफ्लर</a> अपनी पुस्तक त्रयी Future Shock, Power Shift और Third Wave में इस बात को बखूबी इंगित करते हैं...<br /><br />जरा सोंचिये...ज्यादा दूर न जाकर सिर्फ पिछले २ हज़ार सालों का इतिहास उठाते हैं...करीब १६०० इस्वी तक मानव समाज पूर्णतः कृषि आधारित था...अगले मात्र ३०० सालों में औद्यौगिक क्रांति ने पूरे विश्व में पैर पसार लिये. कृषि आधारित समाज को उद्योग आधरित समाज बनने में मात्र ३०० साल...??<br />अगर मानव उत्पत्ति का इतिहास देखा जाये,तो ३०० साल मानव जाति के तो संपूर्ण इतिहास के लिये एक पल के बराबर भी नहीं हैं...<br /><br />इसकी तुलना किजिये इस बात से,कि जब मानव अपने वर्तमान स्वरूप में आया (होमो सेपियन्स, जो सीधा चल सकते थे....सोंच सकते थे..आदि आदि)..तो उसे लाखो वर्ष खानाबदोश से कृषि आधारित समाज बनने में लगे...कृषि आधारित समाज भी कई हजार वर्ष तक चलता रहा...लेकिन कृषि से उद्योग की दूरी सिर्फ ३००-४०० साल में...????<br /><br />और अब आइये वर्तमान युग में और इसी चीज की तुलना कीजिये पिछले ५० वर्ष में हुए बदलाव से...हम Industrial Revlution को पीछे छोड कर Information Revolution में प्रवेश कर रहे हैं...जिसका कि उदाहरण ये कम्प्यूटर, इन्टरनेट और मोबाइल क्रांति है और अगर बदलाव की यही दर रही तो सोंचिये अगले २० वर्ष हमें कहाँ से कहाँ ले जाने वाले हैं?<br /><br />सूचना क्रांति की बाद कौन सी क्रांति होगी...Genetic?...Biotech...?और क्या इन परिवर्तनों के लिये मानव(शरीर एवं समाज दोनो)..मानसिक, भौतिक और जैविक रूप से तैयार है?<br /><br />सोंचिये....सोंचते समय ये भी सोंचियेगा कि २० साल पहले आप आज याने वर्तमान(उस समय का भविष्य) के बारे में क्या सोंचते थे?.(बशर्ते कि आप की उम्र २० साल से ज्यादा हो और २० साल पहले आपने अगले २० साल के बारे में सोंचा हो..:))<br /><br />सोंचिये...मानव समाज अगले २० साल में कहाँ होगा, प्राथमिकताएं क्या होगी...और तकनीक...वो हमें क्या क्या दिखा सकती है..क्या क्या गुल खिला सकती है? जरा सोंचिये...<br /><br />और हाँ , अगर आप पढने के शौकीन हैं और आपने टॉफ्लर की उक्त पुस्तकें नही पढी हैं...तो अवश्य पढियेगा...दिमाग की खिडकियाँ खोल देती हैं...(Soft Copy भी मिल जायेगी)Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1147082801153043462006-05-08T03:00:00.000-07:002006-05-08T03:06:41.180-07:00रफ्तार की गहराईअभी कुछ दिन पहले इन्टरनेट पर हिन्दी के प्रचार प्रसार में आने वाली समस्याओं पर एक लेख पढा था, हिन्दी सर्च इंजन के बारे में भी वहाँ कुछ लिखा था, और <a href="http://www.raftaara.com">रफ्तार </a>के बारे में भी...रफ्तार के बारे में बहुत दिन पहले सुना था पर उसे आजमाया नही था...इस लेख को पढ कर सोंचा कि क्यों ना आजमाया जाये...पर नतीजा बडा कष्टप्रद निकला...<br /><br />सबसे पहले हमने हमारा नाम वहाँ डाल कर देखा , <a href="http://www.google.com">गूगल महोदय </a>हमारे नाम को लेकर करीब ३०० <a href="http://www.google.co.in/search?hl=en&q=%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%A8+%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A4%BE&meta=">परिणाम </a>बताते हैं, जिनमे सबसे पहले हमारा ब्लोग आता है, रफ्तार की रफ्तार <a href="http://www.raftaar.com/search.aspx?SearchString=भारत&CurrentPage=1">सिर्फ ४० </a>तक ही पहुँच पाई :(...बहुत दुखः हुआ, फिर सोंचा कि हम तो आम जनता हैं, हमारा नाम इतना महत्वपूर्ण भी नही है, शायद रफ्तार ने शामिल करना ही उचित नही समझा हो, तो 'भारत' को लेकर यही प्रयोग आजमाया... भारत शब्द को लेकर रफ्तार कुछ <a href="http://www.raftaar.com/search.aspx?SearchString=भारत&CurrentPage=1">१८००० परिणाम </a>दिखाता है, यही शब्द जब मै गूगल महोदय के पास लेकर गया तो उन्होने <a href="http://www.google.co.in/search?hl=en&q=%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4&meta=">९,९२,००० परिणाम दिखाये</a>...याने ५० गुना फर्क !!!<br /><br />दिल तो बहुत दुखा, पर कुछ कर नही सकते थे...सोंचा के क्यों न थोडी समाज सेवा की जाये, मुख पृष्ठ पर नीचे एक लिंक थी, <a href="http://www.raftaar.com/mainpage.aspx">'हिन्दी वेब साइट बताएं'</a>..हमने सोंचा कि अपना ब्लोग तो यहाँ डाल ही देते हैं, हिन्दी का कुछ तो भला होगा, पर जब यहाँ भी आगे बढे तो ऐसे ऐसे <a href="http://www.raftaar.com/submitpage.aspx">सवाल </a>दागे गये, कि हमने भाग छूटने में ही अपनी भलाई समझी...मसलन्.....फॉन्ट का नाम, फॉन्ट का परिवार(Family)..और यहाँ तक कि उसका चरित्र (बोले तो, font character ;))...पूँछ डाला, अब भाई हम तो सीधे सीधे हिन्दिनी के <a href="http://www.hindini.com/tool">हग टूल</a> पर टाइप करके चिपका देते है, ये नाम, पता, परिवार और चाल चलन हम कहाँ से बताएं, सो फ्रस्टा कर हमने रफ्तार पर ब्रेक लगाये, गूगल जिन्दाबाद बोला और ये ब्लोग लिखने बैठ गये....Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1146634066986037792006-05-02T22:20:00.000-07:002006-05-02T22:28:48.280-07:00अपने अपने फर्ज<span style="font-family:trebuchet ms;">विदेशों में स्वेच्छा से पैसा कमाने गये भारतीयों की सुरक्षा का जिम्मा सरकार ले या ना ले, इस पर काफी बहस चल रही है...</span><a href="http://nuktachini.debashish.com/123"><span style="font-family:trebuchet ms;">नुक्ताचीनी </span></a><span style="font-family:trebuchet ms;">में इस पर लेख लिखा गया, </span><a href="http://qtoday.blogspot.com/2006/05/blog-post_02.html"><span style="font-family:trebuchet ms;">युगल </span></a><span style="font-family:trebuchet ms;">ने अपने चिट्ठे में इस पर एक सवाल छोडा, और </span><a href="http://hindini.com/hindini/?p=119"><span style="font-family:trebuchet ms;">हिन्दिनी </span></a><span style="font-family:trebuchet ms;">पर भी इस बारे में चर्चा हुई..</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैं कुछ प्रश्न उठाना चाहूंगा...</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">जब कोई भारतीय(या अनिवासी भरतीय)विदेश नें जाकर नाम और शोहरत कमाता है, तो क्या हम अपने गाल बजाकर खुश नही होते?</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">क्या हम बाहर जाकर बसे भारतीय से यह अपेक्षा नही करते कि वो भारत में निवेश करे, भारत कि उन्नति में योगदान दे...?</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">क्यों हम बडे बडे सम्मेलन आयोजित करते हैं जिनमें बाहर जाकर बसे भारतीयों से देश की तरक्की में हाथ बंटाने की अपील की जाती है? </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">अब अगर देश यह उम्मीद रखता है, कि देश का नागरिक(या अनिवासी नागरिक), देश के प्रति अपना फर्ज समझे, तो क्या फिर देश और सरकार का यह फर्ज नही है कि उन्ही नागरिकों की सुरक्षा और हिफाजत के लिये वो दुनिया की किसी भी ताकत टकरा जाये और इतना कडा और कूटनीतिक रुख अख्तियार करे कि आगे कोई इस तरह की हरकत करने की हिमाकत ना करे ? </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">क्या हमारी आज की स्थिति पूर्व में की गयी कूटनीतिक भूलों का परिणाम नही है? अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इन भूलों को दुहराएं और आने वाली पीढियों को भी परेशान करे, या फिर इनमें सुधार करने का प्रयत्न करें?<br /><br /></span><span style="font-family:trebuchet ms;"></span>Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1146224686316420072006-04-28T04:41:00.000-07:002006-04-28T04:44:46.333-07:00मिसाल<span style="font-family:trebuchet ms;">हरा भरा ठूंठ.</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">ताज़िन्दग़ी ढोया हुआ,</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">थोडा सच, थोडा झूठ.</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">बोलता पानी.</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">बरसों से चुप,</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">खामोश जुबां की कहानी</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">चूल्हे में राख.</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">आक्रोशित मन की, </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">बुझी हुई आग.</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">टूटा फूटा सामान.</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">बरसों से संजोये हुए,</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">बिखरे हुए अरमान.</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">तपती हुई रेत,</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">अकाल की मार से,</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">पिचका हुआ पेट.</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मिसालें हैं कई.</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">कुछ कही, कुछ अनकही,</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">कभी ग़लत, कभी सही.</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">कुछ शब्द बन कर निकलीं,</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">कुछ आँसू बन कर बही.</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">थोडा बहुत कह दिया,</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">काफी कुछ दिल में ही रही.</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"> # नितिन - २८ अप्रेल २००६</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span>Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1145969120165484842006-04-25T05:42:00.000-07:002006-04-25T05:45:20.186-07:00कैसा होगा मौसम...?<span style="font-family:trebuchet ms;">समझ नही आ रहा इसे खुश खबरी मानें या दुखखबरी, मौसम विभाग ने फरमाया है कि इस साल मानसून सामन्य से कम रहेगा...<br />भई है तो दुख खबरी ही, क्योंकि अपने यहाँ में हिन्दुस्तान तो पूरा बाजार ही मानसून पे टिका हुआ है...तो फिर खुशखबरी क्यों...वो इसलिये,कि जरा बताइये पिछली बार कब ऐसा हुआ था कि मौसम वालों ने सटीक भविष्यवाणी की थी?अगर कहते हैं कि मौसम शुष्क रहेगा तो मतलब होता है कि छाता लेकर ही घर से निकलना...बारिश हो सकती है...और अगर बूंदाबांदी के आसार बताए, तो समझिये कि बिन्दास धूप निकलेगी...बिल्कुल बेफिक्र रहिये...<br />एक बात और है...इनका सामान्यता का पैमाना भी थोडा टेढा होता है...अगर किसी एक भाग में १०० सेमी बरसात(याने बाढ) हुई और किसी एक में ७८ सेमी (याने कम) तो इनका औसत हो गया ८९ सेमी(जो कि सामन्य है)...तो फिर क्या फिकर है...?<br />याने सामान्य से कम मानसून को अभी तो हमारा (Un)Common sense मान नही रहा है </span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">और फिर राम जी के आगे किसी की चली है भला......<br /></span>Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1145785334937653932006-04-23T02:39:00.000-07:002006-04-23T02:42:14.953-07:00एक अदद मकान<span style="font-family:trebuchet ms;">पिछले ८-१० दिन से नवाबों के शहर हैदराबाद में हूं...रोजी रोटी, याने नौकरी, घर से बहुत दूर खींच लायी है.नया शहर , नयी नौकरी और नये लोग...अभी हमारे सामने सबसे बडी समस्या है, नया घर ढूंढने की, फिलहाल एक होटल में रह रहा हूं पर ज्यादा दिन तो होटल में नही रह सकते ना..और कब तक अनिकेतन रहेंगे..</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">कल शनिवार, याने वीकेंड था, और पहला दिन, जब हम फ्री थे...तो निकल पडे फ्लेट/मकान ढूंढने...</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">काफी धक्के खाये पर अभी कुछ मिला तो नही, पर कसम से...एक आध जगह तो क्या रोचक वाकयात हुए...<br />एक जगह..To-Let का बोर्ड देख कर घंटी बजायी...<br />एक छोटी लडकी ने, खिडकी में से ही पूंछा..."क्या है?"<br />"जी वो मकान..."<br />कुछ पूंछने भीतर गयी...फिर आयी,<br />"हिन्दू, या मुस्लिम?"<br />"जी हिन्दू"</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">फिर कुछ पूंछने भीतर गयी...फिर आयी<br />"वेज्ज, या नोन वेज्ज...?"<br />मैं बोला...मै वेज्ज, मेरा दोस्त नोन वेज्ज<br />अब तक थोडा गुस्सा आने लगा था, पर मकान तो चहिये था...<br />वो लडकी फिर भीतर गयी, और इस बार एक बुजुर्ग महिला साथ आयी...<br />"फेमिली, या बेच्चलर..?"<br />"जी बेच्चलर.."<br />"नही जी, हम तो सिर्फ फेमिली को ही देते है.."<br />मन में इतना उबाल आ रहा था...पर, मुँह पर मुस्कान लाकर बोला..."आंटी, हम भी शरीफ बच्चे हैं"..<br />"वो ठीक है बेटा, पर हम फेमिली को ही देते है"...<br />मन ही मन हजार गालिया देते हुए वापस चल पडे...<br />इसी तरह २-४ जगह ठोकरे खायी, पर हमारा "बेच्चलर" होना किसी को रास नही आया...<br />अब कैसे समझायें इन्हे, अभी नौकरी लगी है, थोडा वक्त दीजिये, शादी भी हो जायेगी...पर अभी तो सबसे बडा सवाल ये है, कि तब तक हम हैदराबाद मे रहेंगे कहां....<br />है कोई जवाब?<br /><br /> </span>Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1144480454913019982006-04-08T00:13:00.000-07:002006-04-08T00:14:14.930-07:00बडे दिनों के बादकाफी दिनों बाद यह लिख पा रहा हूँ...पिछले एक महीने से घर पर था...यानी internet और cyberspace से एकदम दूर...<br />अभी बहुत देर से पुराने चिट्ठे पढने का प्रयास कर रहा हू...इतना कुछ लिखा गया है यहा पर कि कम से कम ३-४ दिन तो लगेंगे हि सब कुछ पढने में..<br />कल यहाँ चेन्नई में अपनी पहली नौकरी शुरू की...थोडे दिनों में काफी कुछ बदल जायेगा...IIFM पीछे छूट गया, दोस्त छूट गये..नये लोग नया काम<br />कालेज की बेफिक्री के दिन तो बहुत ही याद आयेंगे...<br />खैर फिर एक बार , नियमित रूप से लिखने की कोशिश करूंगाNitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1138899142136593632006-02-02T08:48:00.000-08:002006-02-02T08:52:22.150-08:00क्या हम लातों के भूत हैं?<span style="font-family:trebuchet ms;">अभी इंडिया टुडे के ताजा अंक में एक सर्वेक्षण के परिणाम देख रहा था. क़ौन सा पूर्व प्रधानमंत्री आज की समस्याओं से जूझने में सर्वाधिक योग्य है...?</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">?४१% मत इंदिरा जी को...एसे २-४ सर्वेक्षण पहले भी देख चुका हूं, इंदिरा गांधी को हमेशा सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं...</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">ऐसा क्यों है जबकि उनके साथ भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय यनि 'आपातकाल' जुडा हुआ है....., किंन्तु कई लोग तो आपातकाल को देश का सबसे अच्छा समय बताते है...वजह, बस-ट्रेन समय पर चलती थें, कोई रिश्वत लेने की हिम्मत नही कर सकता थ, तुरत फैसले होते थे..आदि आदि...</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">इसी प्रकार मैने कई बुजुर्गों के मुह से मैने अंग्रेज शासन की भी बहुत प्रशंसा सुनी है (आज के हालात से तुलना करते हुए)...सख्ती वहां भी बहुत थी..</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">क्या ये दोनों उद्धरण इस बात की ओर इंगित करते हैं कि हम लोग सिर्फ तभी सीधे चल सकते है जब हम पर डंडे की सख्ती की जाये...देसी भाषा में...क्या हम लातों के भूत हैं?...जब तक सजा होने का या पकडे जाने का डर नही हो, हम किसी भी प्रकार के नियम पालन करने को अपनी हेठी समझते हैं...क्या थोडी सी छूट मिलते ही हमारा दिमाग खराब हो जाता है?</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">ऊपर जिस सर्वेक्षण का उल्लेख मैने किया है, मेरे हिसाब से उसमें भाग लेने वाले अधिकतर लोग २५-४० की उम्र के बीच होते है...४० का व्यक्ति आपातकाल में १०-१२ वर्ष का रहा होगा...याने आज जो भारत की युवा पीढी है, उसने तो आपातकाल की स्थेति नही देखी (या महसूस नही किया), सिर्फ सुनी ही है...जैसे मैने सुनी है..लेकिन क्या आज भोगी हुई आजादी के बाद हम कल्पना कर सकते हैं कि सूचना पर प्रतिबंध लगा दिया जाये, य व्यवस्था के विरुद्ध मुह खोलते ही जेल मे डाल दिया जाये, या जबरदस्ती पकड कर नसबंदी कर दी जाये?</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">जी हाँ, ये सब भी होता था उस समय, और अगर ऐसा था तो हम कितने भाग्यशाली है, जो इतनी स्वच्छंद जिन्दगी जी रहे है?लेकिन क्या इस स्वच्छंदता के साथ हम न्याय कर पा रहे है? क्या हम इसके अधिकारी है? The way, we take things for granted, क्या हमें काफी कुछ सोंचने और समझने की जरूरत नही है?</span>Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1136387673286126972006-01-04T07:10:00.000-08:002006-01-04T07:14:33.296-08:00सिगरेट के धुएं का छल्ला उडा के....कुछ महीने पहले एक आदेश जारी हुआ था(शायद केन्द्र सरकार द्वारा), कि बडे परदे पर धूम्रपान दिखाया जाना प्रतिबंधित किया जायेगा.<br />इसे लागू करने की तारीख भी घोषित की गई थी(शायद २ अक्तूबर २००४ से). फिल्म वालों ने काफी हो हल्ला भी मचाया था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न भी उठा था लेकिन सरकार अडी रही थी और आदेश वापस नही हुआ था..<br />लेकिन भारत देश के अन्य असंख्य कानूनों क़ी तरह इसका भी अनुपालन करने का शायद किसी का कोई विचार है नही...अभी २-४ दिन पहले 'एक अजनबी' देख रहा था, अर्जुन रामपाल धडल्ले से छल्ले उडा रहे थे....और भी कई फिल्में होंगी, जो मैने नही देखी<br />कुछ सवाल उठते हैं...<br />जब कानून के पालन की कोई मंशा नही होती , तो बनाने की खुजली क्यों चलती है? किसी ने कहा था इस तरह का कानून बनाने को? या और कोई कारण था (सिगरेट कंपनियों से मोटा चंदा वसूलना था?)<br />अगर उल्लंघन हो रहा है, तो सजा क्या हो?<br />परदे पर धूम्रपान दिखाया जाना ज्यादा आपत्तिजनक है, या 'गरमागरम' सीन?Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1136128078530419862006-01-01T07:03:00.000-08:002006-01-01T07:07:58.540-08:00नया साल, वही चाल ढाल....नया साल आप सबको(और मुझे भी)बहुत बहुत मुबारक<br /> ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि नये साल में मेरी और आप सबके मन की मुरादें पूरी हों<br /> कँवारों की शादी हो जाये (मैं तो अभी Underage हूँ), बेरोजगारों को नौकरी मिले (वो तो मुझे भी चहिये, wish me luck),जिनके शटर गिर चुके हैं वे फिर से लिखना शुरू करें, हिन्दी ब्लोगर्स की संख्या हजार के पार पहुँचे, मै नियमित रूप से लिखता रहूँ, रोज नहाऊं, कम सोऊं....आदि आदि<br /><br /><br /><a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://photos1.blogger.com/blogger/1617/506/1600/HNY.jpg"><img style="margin: 0px auto 10px; display: block; text-align: center; cursor: pointer;" src="http://photos1.blogger.com/blogger/1617/506/320/HNY.jpg" alt="" border="0" /></a><br />कुछ और भी मुरादे और कल्पनाएं हैं, जरा गौर फरमाइये...<br /><br />दादा टीम में बने रहे, और जब निकाला जाये, तो ससम्मान निकलें<br />उमा भारती के गुस्से से शिवराज सिंह चौहान बचे रहें<br />अबू सलेम इसी तरह मुम्बई पुलिस की मेहमान नवाजी कबूलता रहें, (तब तक राम गोपाल वर्मा उसकी जेल लाइफ पर भी २-४ फिल्में बना देंगे)<br />हिन्दी फिल्मों से कहानी , बिल्कुल कांग्रेस से नटवर सिंह की तरह गायब हो जाये और 'किसिग सीन' ग्रेग चैपल की तरह सुर्खिओं में बने रहें<br />हफ्ते में एक की दर से स्टिंग आपरेशन होते रहें<br />देश सूनामी, भूकम्प और मुम्बई बरसात जैसी आपदाओं से बचा रहे<br />सेंसेक्स १०-१२ हजार तक तो पहुँच ही जाये<br />टीम इंडिया पाकिस्तान सीरिज जीत कर आये<br />सट्टे और जुए जैसे सीरियल्स वापस बंद हो जाएं<br /><br />अगर आपकी भी कुछ इच्छाएं है तो लिख डालिये...क्या पता, किसी दिन बाँकेबिहारी, गय्या चराते हुए, घूमते फिरते आपके ब्लोग पर पहुँच जायें, और दे दें.........एक अदद टिप्पणी....:))Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1135950090540985482005-12-30T05:37:00.000-08:002005-12-30T08:39:28.690-08:00सुर्खियों में....<span style="font-weight: bold;">IISc पर हमला</span><br />भारतीय विज्ञान संस्थान पर परसों रात हुए आतंकवादी हमले को देश् की बौद्धिक संपदा पर हमले के रूप में देखा जा सकता है ...साथ ही ये इस और भी संकेत करता है, कि आतंकवादी अब राजनैतिक और धर्मिक निशानों के अलावा अन्य निशाने भी ढूंढ रहे हैं...<br />आज विश्व में भारतीय वैज्ञानिकों, प्रबंधकों और तकनीकी विशेषज्ञों को जो सम्मान प्रप्त है, वो IISc जैसे संस्थानों की ही देन है, अतः कोई आश्चर्य नही कि आतंकवादी इन्हें निशाना बनाने का प्रयास करें..<br />IIT दिल्ली के प्रो.पुरी को श्रृद्धांजली<br /><br /><br /><span style="font-weight: bold;">आमिर खान की शादी</span><br />आमिर खान और किरण राव की शादी मीडिया की सुर्खियाँ बनी हुई है, पर एक और शख्स जो इस शादी से सबसे ज्यदा आहत(या प्रभावित) हुआ होगा, उस पर किसी का ध्यान नही गया, आमिर की पहली बीवी, रीना. उन्होने आमिर से तब शादी की थी, जब आमिर सुपरस्टार नही थे, और फिल्मी दुनिया में उनके पैर जमें नही थे, लगान के निर्माण के समय भी रीना ने आमिर की कम्पनी को पूरी तरह संभाला था.दोनो का तलाक कुछ समय पहले हुआ. बडा आश्चर्य होता है कि कोई कैसे १६ साल एक साथ रहने के बाद एक दूसरे को छोड सकता है.<br />अभी २-३ दिन पहले दैनिक भास्कर में इस पर जय प्रकाश चौकसे ने अच्छा लेख लिखा थाNitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1135363561365691192005-12-23T10:35:00.000-08:002005-12-24T22:45:40.126-08:00वर्ष २००५ में पढी गई पुस्तकेंआज <a href="http://saptrang.blogspot.com/2005/12/blog-post_23.html">अवलोकन-२००५</a> के अंतर्गत, पाठ्यक्रम के अतिरिक्त वे पुस्तकें जिन पर हाथ साफ करने में सफल हुआ...<br /><p>Life of Pi <span style="font-size:78%;">by</span> <em>Yann Martel</em> </p><p>Da vinci Code <span style="font-size:78%;">by</span> <em>Dan Brawn</em></p><p>गुनाहों का देवता <span style="font-size:78%;">कृति</span> <em>धर्मवीर भारती</em></p><p>गोरा <span style="font-size:78%;">कृति</span> <em>रवीन्द्र नाथ टैगोर</em></p><p>Four Blind Mice <span style="font-size:78%;">by</span> <em>James Patterson</em> </p><p>*Harry Potter & Half Blood Prince <span style="font-size:78%;">by</span> <em>J K Rowling</em> </p><p>State of Fear <span style="font-size:78%;">by</span> <em>Michale Crichtone</em> </p><p>Deception Point <span style="font-size:78%;">by</span> <em>Dan Brawn</em> </p><p>*Angels & Damons <span style="font-size:78%;">by</span> <em>Dan Brawn</em> </p><p>*Digital Fortress <span style="font-size:78%;">by</span> <em>Dan Brawn</em> </p><p>A Thousand Suns <span style="font-size:78%;">by</span> <em>Dominique Lappire</em> </p><p>O Jerusalam <span style="font-size:78%;">by</span> <em>Dominique Lappire & Larry Collins</em></p><p>Devil's Alternative <span style="font-size:78%;">by</span> <em>Fredrick Forsyth</em> </p><p>मेरा गाँव, मेरा तीर्थ <span style="font-size:78%;">कृति</span> <em>अन्ना हज़ारे</em> </p><p>Out of my Confort Zone <span style="font-size:78%;">by</span> <em>Steve Waugh</em> </p><p>Sony <span style="font-size:78%;">by</span> <em>John Nathan</em> </p><p>Rage <span style="font-size:78%;">by</span> <em>Jonathan Killerman</em> </p>आखिरी दो किताबें अभी चल रही हैं, २-४ दिन में खतम हो जायेंगी.<br />जिन किताबों के आगे * चिन्ह लगा हुआ है उनकी सिर्फ Soft Copy उपलब्ध थी...पर चूँकि पढना जरूरी था...सो दो-दो तीन-तीन दिन तक कम्प्यूटर जी के साअमने आँखें गडाए बैठे रहे ;)<br />उम्मीद करता हूँ कि २००६ के लिये ये सूची और भी लम्बी होगीNitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1135277889274839442005-12-22T10:33:00.000-08:002005-12-22T10:58:09.293-08:00अवलोकन-२००५<span style="font-family:trebuchet ms;">वर्ष २००५ बीत रहा है...आखिरी ८-९ दिन बचे है, और जिधर देखो उधर अलविदा २००५ का शोर सुनाई दे रहा है.मैंने सोंचा क्यों न खुद भी २००५ में अपनी आप बीती का अवलोकन किया जाये और देखा जाये कि कैसे बीता ये साल...</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">सबसे पहली बात तो, यह साल सही मायनों में मेरे लिये घुमंतू साल रहा, इस साल जितना घूमा उतना पहले कभी नही. झारखंड, उडीसा, आंद्रप्रदेश ,मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और खुद अपने राजस्थान के कई हिस्से नाप डाले.</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">साल शुरू हुआ, झारखंड में चाईबासा के एक वन विभाग के विश्राम गृह से, जहाँ की बिजली, बिल न भरे जाने के कारण काट दी गई थी, याने ३१ दिसंबर २००४ की रात को(और १ जनवरी २००५ की सुबह) हम निपट अंधेरे में थे...फिर एक हफ्ता राँची रह कर वापस भोपाल में तीसरा Term पढाई की. अप्रेल मध्य से फिर निकले Organisational Training-I के लिये. उडीसा के ७-८ जिले और मध्यप्रदेश में शहडोल. फिर जुलाई से चौथा Term और फिर सितम्बर अंत में Organisational Training-II के लिये, पहले उदयपुर और आसपास, फिर राँची, भुवनेश्वर, हैदराबाद, रायपुर, गुजरात आदि....</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">धन्यवाद IIFM इन सब जगहों और यहाँ के लोगों को नजदीक से देखने का मौका देने के लिये, अभी तो एक ही मूल मंत्र है, छात्र जीवन में जितना घूम सकते हैं, घूम लो, पता नही, (अ)कल हो न हो.</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">इसी के चलते करीब १८-२० साल बाद फिर नाथद्वारा जाकर श्रीनाथ जी के दर्शन पाये, उसके पहले मेरा मुंडन यही हुआ था, शायद सन ८३-८४ में फिर कभी जाने का मौका नही लगा. जून में अपनी उडीसा यात्रा के दौरान जगन्नाथ पुरी जाकर भगवान जगदीश के दर्शन भी पाये. कोणार्क का प्रसिद्ध सूर्य मंदिर देखा तो खारे पानी की मशहूर चिल्का झील भी,हैदराबाद की चारमिनार, तो उदयपुर के पास कुम्भलगढ का किला जहाँ महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था....</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">और हाँ , इसी के साथ जिन्दगी में पहली बार कुछ कमाया. वैसे सही मायनों में कमाई नही कह सकते, था यह अपनी दो Organizational Trainings का Stipend... पर था तो मेहनत का पैसा, खुशी बहुत हुई मुझे.</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">वैसे तो ब्लोग शब्द वर्ष २००४ में NET पर सर्वाधिक चर्चित शब्द रहा था, पर अपना तो यह इसी साल हुआ. जनवरी में अपनी </span><a href="http://www.nibgib.blogspot.com"><span style="font-family:trebuchet ms;">अंग्रेजी बकवास </span></a><span style="font-family:trebuchet ms;">से शुरुआत की और जुलाई आते आते इस <strong>हिन्दी <a href="http://www.saptrang.blogspot.com">इन्द्रधनुष</a></strong> में रंग भरे(वैसे २००४ में </span><a href="http://www.iifm.blogspot.com"><span style="font-family:trebuchet ms;">IIFM Blog </span></a><span style="font-family:trebuchet ms;">पर थोडा बहुत लिखा था)..</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">वैसे लिखने की Frequency उतनी ही रही जितनी मध्य प्रदेश के गाँवों में बिजली की रहती है, पर फिर भी मुफ्त बिजली की तरह ,हिन्दी चिट्ठाकारों के विचार, कहानिया, लेख, कविताओं और टिप्पणियों की सूरत में हमें मुफ्त में पढने को तो मिले.....</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">घर को इस साल खूब Miss किया...सबसे लंबा अर्सा जो घर पे बीता वो था ७-८ दिन, जून अंत में, अन्यथा १-२ दिन से ज्यदा का ट्रिप कोई नही रहा, वो भी खुशकिस्मती क्योंकि भोपाल से घर जाने में ४-५ घंटे ही लगते हैं. बाकी बडे त्यौहार याने दिवाली और दशहरा, बाहर ही मनाने पडे. दिवाली मनी हैदराबाद में...हाँ, जन्मदिन जरूर भाई के साथ उदयपुर में खूब मजे में बीता, पूरा उदयपुर घूमा उस दिन.</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">साल का बडा आर्थिक नुकसान , मोबाइल, जनवरी में हाथ में आया और सितम्बर में गायब...:((</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">पढाई के मोर्चे पर ज्यों के त्यों...साल के शुरू में क्लास में जो Rank थी , अंत में भी कमोबेश वही रही (क्या रही, ये नही लिखूंगा ;-) )</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">अभी इतना ही, आगे और कुछ ध्यान आया तो लिखूंगा...</span>Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1134502027292258632005-12-13T11:23:00.000-08:002005-12-13T11:27:07.306-08:00अपनी 'खोल' से बाहर...<span style="font-family:trebuchet ms;">बहुत दिनों से मैने कोई किताब नही पढी. २ महीने से बाहर होने की वजह से समय भी नही मिल पाता था...बीच में पाउलो कोहेलो की "द अल्केमिस्ट" पढी थी, पर वो मैने पहले ही पढी हुई थी...इसके अलावा सुरेन्द्र मोहन पाठक के एक्-दो उपन्यास ट्रेन में पढे थे, पर कोई serious reading नही हुई थी.</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;"></span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">कल स्टीव वा की आत्मकथा,"आउट आफ माय कम्फ़र्ट जोन" (Out of My comfort Zone) हाथ लगी है, उसे निपटा रहा हूँ, इस सप्ताह में खत्म करने का मानस बनाया है.हिन्दी में शायद इसका मतलब होगा, "अपने सुरक्षा कवच(या 'खोल') से बाहर"...</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">आमुख की दो पंक्तियाँ काफी अच्छी लगी,यहा चिपका रहा हूँ</span><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">"....I have come to learn that life wouldn't be as enjoyable if it was always easy, and that personal growth comes from having to move out of your comfort zone...."</span><br /><br /><span style="font-family:trebuchet ms;">मैने भी कई बार अनुभव किया है कि इस Comfort Zone से एक बार निकलना काफी मुश्किल होता है, किन्तु यदि निकल गये, तो काम मे बडा मजा आता है और सफलता की संभावना भी ज्यादा रहती है....लेकिन इस जंजीर को तोडना होता बडा दुष्कर है...</span>Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1133965437813297532005-12-07T06:18:00.000-08:002005-12-07T06:23:57.823-08:00लगता है, समय खराब चल रहा है...पहले मोबाइल खोया था, उसके झटके से उबर कर अब नया लेने का विचार कर रहा था, कि कल कम्प्यूटर का मदरबोर्ड "उड" गया...यानि दो-ढाई हजार का खर्च फिर सर पे...वारंटी भी दो महीने पहले निकल चुकी है...:(..सारा वित्तीय इंतजाम गडबड हो गया .<br />खैर, वापस IIFM पहुँच गये हैं, फिर वही पुरानी दिनचर्या और जिन्दगी...ऊपर से इस बार शेड्यूल बहुत 'टाइट' है...Nitin Baglahttp://www.blogger.com/profile/18440781901122132231noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-14338716.post-1132771204088131252005-11-23T10:27:00.000-08:002005-11-23T10:40:04.110-08:00हम फिल्में क्यों देखते हैं - अनुगूँज १५<div align="justify"><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/1617/506/1600/anugunj-anniversary(1).0.png"><span style="font-family:trebuchet ms;"><img style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/1617/506/320/anugunj-anniversary%281%29.0.png" border="0" /></span></a><span style="font-family:trebuchet ms;"> जब से अनुगूँज का विषय घोषित हुआ है, सोंच रहा हूं, इस बार मैं भी लिख ही दूं वैसे भी यह वर्षगाँठ स्पेशल है, और विषय भी ऐसा है कि इस पर 'कुछ' लिखा जा सकता है.</span></div><div align="justify"><span style="font-family:trebuchet ms;">तो जैसा कि सुनील जी पहले ही </span><a href="http://www.kalpana.it/hindi/blog/2005/11/blog-post_20.html"><span style="font-family:trebuchet ms;">'हम' को परिभाषित करने की कोशिश </span></a><span style="font-family:trebuchet ms;">कर चुकें हैं. यहाँ तो मैं सिर्फ यह लिखूंगा, कि मैं फिल्में क्यों देखता हूँ...</span></div><div align="justify"><span style="font-family:trebuchet ms;">सौभाग्यवश मैने सेटेलाइट व केबल टी.वी. को अपनी उम्र के साथ बढते देखा है,और मेरे विचार में केबल के आने के बाद से ही भारत में फिल्में गाँव ग़ाँव में देखी जाने लगी, अन्यथा, जैसा कि </span><a href="http://www.jitu.info/merapanna/?p=465"><span style="font-family:trebuchet ms;">'बुजुर्ग' लोग कह </span></a><span style="font-family:trebuchet ms;">रहे हैं कि उनके बचपन में सिनेमा जाने पर कितनी पाबंदी होती थी और वैसे भी ये सर्वसुलभ नही होते थे...कभी मेले-तमाशे में जरूर आ जाया करते थे...</span></div><div align="justify"><span style="font-family:trebuchet ms;">तो फिर मूल प्रश्न पर आया जाये, कि मैं फिल्में क्यों देखता हूं.दरअसल अपनी छोटी सी जिन्दगी में उम्र के हर पडाव पर, इस सवाल का मेरा जवाब अलग अलग रहा होता...आज सब जवाबों को एक साथ Compile करने की कोशिश करता हूँ.</span></div><div align="justify"><span style="font-family:trebuchet ms;">फ़िल्में देखने की मेरी पहली यादें जुडी हुई है,'८६-८७ के करीब हमारे पुराने मकान में आये नये नये टी.वी. से. जमाना सिर्फ दूरदर्शन का था और टी.वी.मोहल्ले के ३-४ चुनिन्दा "डिब्बों" में एक (SONY Orson माडल का यह श्वेत-श्याम टी.वी. कई बरस तक हमारे घर का साथी बना रहा और अभी मात्र १०-११ महीने पहले Retire हुआ.)...तो उस समय सप्ताह में मात्र एक फिल्म आती थी, रविवार शाम ५:४५ पर...और वो हम किसी कीमत पर नही छोड सकते थे...फिल्म के बीच में सिर्फ एक 'ब्रेक' हुआ करता था...और फिल्म हम सिर्फ 'लडाई' देखने के लिये देखते थे...यानि फिल्म में अगर लडाई है, तो अच्छी, अन्यथा कोई काम की नही...अच्छा, यह कैसे पता चलेगा कि फिल्म में लडाई है या नही...अजी बडा सीधा सा मापदंड है, अगर फिल्म में अमिताभ, धर्मेंद्र, जीतेंद्र, मिथुन(ये नाम हमें सन ८७ में याद थे...) आदि में से कोई है, तो वो निश्च्चित रूप से लडाई वाली होगी.</span></div><div align="justify"><span style="font-family:trebuchet ms;">मुझे आज भी याद है, कि एक रविबार को अमिताभ अभिनीत "सौदागर" आने पर मैं पूरे घर में खुश होकर चिल्लता फिरा था, लेकिन पूरी फिल्म में लडाई का इंतजार करता रहा.(अमिताभ उस फिल्म में