Thursday, July 27, 2006

पता परिवर्तन सूचना

सभी खास-ओ-आम को सूचित किया जाता है कि अपनी दुकान नई जगह शिफ़्ट हो गई है...नया पता ये रहा....सिर्फ़ एक क्लिक की दूरी पर..:)
ये दुकान भी चलती रहेगी..पर हो सकता है माल यहां तक पहुंचने में कभी कभी वक्त लग जाये...
नारद जी को अलग से चिट्ठी लिख कर सूचित कर दिया गया है..
जब भी वक्त मिले...पधारियेगा...हम भी कोशिश करेंगे कि दुकान नियमित रूप से चलती/खुलती रहे और वहां माल की आपूर्ती बनी रहे..
सधन्यवाद

Monday, July 17, 2006

२१ वीं अनुगूंज - चुटकुले


हर सफ़ल पुरुष के पीछे एक महिला का योगदान होता है
हर असफ़ल पुरुष ले पीछे....कई महिलाओं का

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अगर आपके पिताजी गरीब हैं तो ये आपकी बदकिस्मती है,
अगर आपके ससुर गरीब हैं तो ये आपकी बेवकूफ़ी है.

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आपका भविष्य आपके सपनों पर निर्भर करता है.
ठीक है..मैं चला सोने.

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खुदी को कर बुलन्द इतना और इतनी ऊंचाई पर पहुंच जा,
कि खुदा खुद तुझ से पूंछे.....
अबे गधे, नीचे कैसे उतरेगा...

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खिडकी खुली, जुल्फ़ें बिखरी,
दिल ने कहा दिलदार निकला.
पर हाय रे मेरी फ़ूटी किस्मत,
नहाया हुआ सरदार निकला.

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कहते हैं, इश्क में नींद उड जाती है.
कोई हमसे भी इश्क कर ले.......
कम्बख्त नींद बहुत आती है

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जिन्दगी में तुम बहुत आगे जाओगे.
क्योंकि जहां भी तुम जाओगे,लोग कहेंगे...
चल बे,आगे चल.

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घडी बिगड्ती है तो बन्द हो जाती है,
लडकी बिगडे तो चालू हो जाती है.

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अटल जी जनसंख्या समस्या पर भाषण दे रहे थे,
भाषण में परिवार नियोजन जैसे उपाय अपनाने पर भी जोर दे रहे थे.
लालू जी पीछे बैठे बहुत देर तक सुनते रहे...आखिरकार उनसे रहा नही गया,
बोले:"अटल जी,आप चुप रहिये. बडे बुजुर्ग कह गये हैं, जिस काम का अनुभव नही हो, उसके बारे में बोलना भी नही चाहिये."

Monday, July 10, 2006

अपना भी एक साल पूरा !!!

अभी अभी ध्यान गया कि कल, ९ जुलाई २००६ को हमारे इस चिट्ठे ने भी अपनी उम्र का एक वर्ष पूरा कर लिया.

जैसी कि रीत है, इस अवसर पर पुनरावलोकन करने की कोशिश की जाती है, तो पहली और महत्वपूर्ण बात तो ये कि इस एक वर्ष में काफ़ी कुछ सीखा. थोडा बहुत लिखा, और सबसे रसभरी बात, काफ़ी कुछ पढने को मिला.

दूसरी बात ये कि चिट्ठों के माध्यम से काफ़ी लोगों को जाना, काफ़ी मित्र बने. सागर जी से कुछ ही दिन पहले सक्षात भी मिल लिये....सही मायनों में पहली बार महसूस किया कि अंतरजाल नये लोगों को मिलाता है.हमारे सहकर्मी हेमनाथन से भी हमारा पहला परिचय ब्लोग(अंग्रेजी वाले) के माध्यम से ही हुआ था.

लिखने की शुरुआत हमने कुछ कविताओं से की थी, लेकिन धीरे धीरे अपनी बकर की भडास भी यहीं निकालने लगे. वैसे लिखने में हमने कोई तीर नही मारे, लेकिन एक बात है कि चिट्ठा लेखन से हमारे सोंचने के तरीके में बदलाव जरूर आया (वैसे सोंचते हम पहले भी थे)..पर अब एक आदत ये हो गई है कि किसी भी घटना-दुर्घटना को देखते हैं तो उसके २-३ पहलू देख लेते हैं..और ये जरूर सोंचते हैं कि क्या इस बात को अपने चिट्ठे पर डाला जा सकता है...यदि हां तो कैसे(ये अलग बात है कि अक्सर ये खयाल ही होते हैं...आखिर हम ठहरे घोर आलसी)

खुशी की बात ये भी है कि इस दौर में हिन्दी का प्रसार नेट पर जोरशोर से चलता रहा, हिन्दी चिट्ठों का आंकडा करीबन ५० से २०० के ऊपर पहुंच गया. हमें खुशी है कि ना सिर्फ़ हम इस प्रगति के साक्षी रहे, बल्कि कुछ हद तक इसमें भागीदार भी रहे :)

एक दुख यह कि हिन्दी लिखने के बाद अपने अंग्रेजी चिट्ठे पर लिखना लगभग छूट गया. क्या करें, जब लिखने की इच्छा होती है, और हिन्दी लिखने का विकल्प सामने होता है तो अंग्रेजी लिखने की इच्छा ही नही होती. कई बार सोंच चुका वहां लिखने की, पर दिल की दिल में ही रह गई...

और हां...नियमित लेखन..इस बारे में भी हम कई बार ठान चुके हैं कि नियमित रूप से लिखेंगे...(चाहे वो दैनिक हो या साप्ताहिक या पाक्षिक )...पर हाय रे आलस्य...आराम बडी चीज है..:)

सौभाग्यवश इस पूरे साल में लगभग नियमित रूप से नेट कनेक्शन हमें मिलता रहा, जिसके चलते ये सब ऐश अपने चलते रहे...देखते हैं आगे कब तक ये चल पायेगा

Monday, July 03, 2006

किरकिट पर कुछ........

भारत ने वेस्टइंडीज में आखिरकार ३५ साल बाद सीरिज जीत ही ली....अनिल कुंबले ने २३ विकेट लेकर एक बार फ़िर साबित किया कि वे अभी भी भारतीय टीम की जान हैं...और द्रविड के बारे में तो कुछ कहने की जरूरत ही नही....a true leader....leading by example....मुझे आश्चर्य नही होगा अगर जल्द ही कोई Management School द्रविड को लेकर Leadership पर कोई Case Study बना दे...

भारतीय टीम को शुभकामनाएं...वैसे सीरिज की विजय फ़ुटबाल के हो-हल्ले में दब कर रह गई....और इतनी चर्चा इसे शायद नही मिली जितनी अन्यथा मिलती...

खैर, इस लेख को लिखने का मेरा म‍ंतव्य सिर्फ़ शुभकामना देना भर नही था....कुछ और बात थी जिसने मेरा ध्यान खींचा ....भारतीय टीम का विदेशी धरती पर जीत का अकाल वैसे तो हमेशा चर्चा का मुद्दा रहता था...लेकिन आज मैने रेडिफ़ पर अब तक की भारतीय जीतों(उपमहाद्वीप के बाहर) की सूची देखी....
अब तक भारत ने उपमहाद्वीप के बाहर १९ टेस्ट जीते हैं.....

मौटे तौर पर अगर में इन विजयों को समय के हिसाब से बांटूं तो वो इस तरह की तस्वीर दिखाती है

सन ६५ से ७५ (१० साल) - ७ टेस्ट (३७ %)
सन ७५ से ८६ (११ साल) - ५ टेस्ट (२६ %)
सन २००० से संप्रति (०६ साल) -७ टेस्ट (३७ %)

अब सिर्फ़ इस मोटे आंकडे को लेकर कुछ मुद्दे/सवाल/विचार.....

क्या यह माना जाए कि सन २००० के बाद भारतीय क्रिकेट की स्थिति मजबूत हुई है ?....गौर कीजिये कि इसी दौर में भारत ने आस्ट्रेलिया को उसी की धरती पर हराया, विश्वकप फ़ाइनल मे‍ पहुंचे, जिम्बावे और वेस्टइंडीज में सीरिज जीती....
और हां एक आक्रामक कप्तान, सौरव गांगुली, विदेशी कोच (जिनका की वरिष्ठ भारतीय खिलाडी हमेशा विरोध करते थे) और कई नये व युवा खिलाडी....

दूसरी बात यह कि क्या कारण थे कि ८६ से २०००..करीब १५ साल जीत का अकाल रहा...ध्यान दें कि यही वह समय था, जब कि क्रिकेट ने भारत के कोने कोने में पैर पसारे....क्रिकेट धर्म बन गया...यह वह समय रहा जब क्रिकेट का जादू पूरे देश में सर चढ कर बोलने लगा...फ़िर ऐसा क्यों हुआ कि इसी काल में भारत उपमहाद्वीप के बाहर एक जीत को तरस गया....

कुछ कारण जो मेरी समझ में आते हैं...

क्रिकेट का जो जादू था, उसका कारण एक-दिनी क्रिकेट रहा..ना कि टेस्ट...इसी वजह से टेस्ट क्रिकेट हाशिये पर पहुंच गया....खिलाडियों के लिये भी, जनता के लिये भी और कर्ता-धर्ताओं के लिये भी...(यहां यह बात कहना चाहूंगा कि पिछले ८-१० साल में टेस्ट का रोमांच फ़िर पैदा हुआ है..श्रेय दूंगा स्टीव वा की आस्ट्रेलियाई टीम को...पोन्टिंग उसी परम्परा को आगे बढा रहे हैं...)

क्रिकेट में पैसे का बोलबाला हो गया...खिलाडियों के लिये प्राथमिकताएं खेल से हट कर विग्यापनों पर आ गई.....और खिलाडी Larger then Life हो गये....(इसी दौर में हमें सचिन तेंदुलकर मिले...पर हां, करीबन सन २००० के बाद से ही वे चोटों की वजह से मैदान के अंदर-बाहर होते रहे है)

जब क्रिकेट में पैसा आया...तो राजनीति भी घुस गई...राजनीति जहां घुस जाये वहां क्या होता है..उससे हर हिंदुस्तानी अच्छी तरह परिचित है....ऐसे लोग व्यवस्था संभाल रहे थे/हैं जिन्होने कभी स्कूल में भी बल्ला नही पकडा होगा....और हां..आरक्षण(कुछ ऐसा होता था शायद कि फ़लां क्षेत्र से इतने खिलाडी तो होने ही चाहिये...)..गनीमत है कि अभी तक आरक्षण के अन्य आधार क्रिकेटियों ने इजाद नही किये...

सट्टेबाजी को यहां लिखूं या नही..ये मैं निश्चित नही कर पा रहा..क्योंकि मेरे हिसाब में ये तो फ़टाफ़ट क्रिकेट में और ज्यादा थी/है(?)...

और कोई कारण आपकी नजर में आये तो बताइयेगा....

सन ८५ से पहले के हालात पर कुछ लिख नही रहा हूं..क्यो‍कि क्रिकेट का इतना इतिहास अभी तक मैने विस्तार में पढा नही है....८५ के बाद तो लगभग सब अपने सामने हुआ है :)...कोई रोशनी/प्रकाश डाल सकें तो खुशी होगी...

Tuesday, June 27, 2006

....कारवाँ बनता गया.

नारद के पुरालेख वाले हिस्से पर नजर डालेंगे तो पायेंगे कि २००६ में अभी तक हिंदी चिट्ठों पर करीब 3000 प्रविष्टियाँ लिखी जा चुकी हैं...खुशी की बात यह है कि २००५ के पूरे साल में जितना लिखा गया था, उससे ज्यादा २००६ की पहली छमाही में ही छाप दिया गया,(यह संख्या सिर्फ उन चिट्ठों की है जिनकी खबर नारद को है...वास्तविकता में यह इससे काफी ज्यादा हो सकती है) और यह सही मायनों में हिन्दी ब्लागमंडल(और अन्तर्जाल)पर हिन्दी के प्रसार का द्योतक है...आशा करते हैं कि २००६ की दूसरी छमाही में हम इससे भी दुगुना-तिगुना-चौगुना लिखेंगे...

साथ ही मैं यह भी आशा करता हूँ कि आने वाले समय में हिन्दी चिट्ठों में विविधता बढती जायेगी....जो कि इन्हे समृद्ध बनाने के लिये काफी जरूरी है...करीब साल भर पहले तक अधिकतर चिट्ठे साहित्यिक हुआ करते थे...मैने खुद अपने चिट्ठे की शुरुआत अपने कुछ कविताओं से की थी...जिन्हे कोई नही पढता था...लेकिन अब काफी बदलाव आ रहा है साहित्यिक के साथ तकनीकी ज्ञान , खबरी, धार्मिक चिट्ठे भी दिखाई दे रहे हैं...हाँ टोने-टोटके की आलोचना और इसके बंद किये जाने का मुझे दुख हुआ...

परिचर्चा के आने से लोगों के बीच संवाद भी बढा है..हाँ इसका चिट्ठाकारी पर क्या असर पडेगा ये देखना होगा...क्योंकि कम से कम एक ऐसे चिट्ठाकार को तो मैं जानता हूं, जिन्होने परिचर्चा शुरु होने के बाद से चिट्ठे पर लिखना कम कर दिया है(और इस बात को स्वीकार भी किया है)...बाकि लोगों के क्या हाल है कृपया अवगत कराएं

एक और विचारणीय तथ्य...कई पुराने चिट्ठों के शटर डाउन हो चुके हैं...उम्मीद है कि वे पुनर्जीवित होंगे और फिर से लिखना शुरू करेंगे...

Monday, June 26, 2006

राकेश रोशन की फिल्में

रितिक/राकेश रोशन की नई फिल्म "कृष" के काफी अच्छी से लेकर बहुत खराब समीक्षाएं सुन/पढ चुका हूं..अभी देखी नही है सो अपनी राय तो नही दे सकता, लेकिन राकेश रोशन निर्देशित फिल्मों(पिछली ४-५)को देखें..और जरा गौर करें तो पायेंगे कि कुछ आधारभूत बातें उनकी हर फिल्म में एक जैसी होंगी..जैसे
फिल्म के पहले आधे भाग में हीरो बिल्कुल सीधा साधा होगा...हीरो-हीरोइन मिलेंगे..इश्क-विश्क होगा, गाने गाये जायेंगे...और आप सोंचेंगे...."ये कहाँ आ गये हम..."
मध्यांतर के ठीक पहले, फिल्म में एक अच्छा सा पेंच (twist) दे दिया जायेगा..और यहाँ से फिल्म एकदम रोमांचक मोड ले लेगी..अर दर्शक फिल्म से बंधा हुआ रह जायेगा..
अच्छे गाने/लोकेशन्स/हीरो/हीरोइन तो लगभग हर निर्देशक उपलब्ध करा लेता है, लेकिन आजकल की लगभग सारी फिल्मों में और खासकर रोमांच फिल्मों में सबसे बडी समस्या यहीं आती है, कि पहले हाफ में तो फिल्म ठीक ठाक चलती है,लेकिन मध्यांतर के बाद निर्देशक फिल्म पर अपनी पकड खो देता है...और अंत आते आते तो ऐसा लगता है कि जबरन फिल्म को खत्म किया जा रहा है...
अगर कोई निर्देशक फिल्मे के दूसरे भाग पर पकड मजबूत रखे...तो सफलता की संभावना भी बढ जाती है...

Monday, June 05, 2006

सुर्खियों से हट कर

आज आरक्षण,महाजन,आमिर खान,लाभ का पद,क्रिकेट इत्यादि के अलावा कुछ बातें...

क्या आपको गेहूँ के भाव पता हैं?....
पिछले कुछ दिनों(महीनों)से १० रुपये प्रति किलो से १८-२० रुपये प्रति किलो तक चल रहे हैं
सरकार देश के किसानों से ७ रुपये किलो गेहूँ खरीद रही है, और दूसरे देशों से १० रुपये किलो तक में आयत कर रही है
उडद मूँग चना तुवर आदि दालों के भाव ४६ से ६० रुपये प्रति किलो जा पहुँचे हैं..
शकर २०-२१ रुपये किलो हो गई है
सब्जियों के दाम भी कमोबेश आसमान छू रहे हैं (वैसे मैने बहुत दिन से खरीदी नही)
चांदी १८-१९००० रुपये प्रति किलो....साल डेढ साल पहले तक ८-१० हजार रुपये प्रति किलो थी
सोना ९-९५०० रुपये प्रति दस ग्राम...साल डेढ साल पहले तक ६-७००० रुपये प्रति दस ग्राम था
रेलवे स्टेशनों पर सार्वजनिक नलों में पानी नही मिलता हर जगह् बोतलबंद पानी जो उपलब्ध है... पेट्रोल और डीजल के दाम के बारे में कुछ ना कहना ही बेहतर है....अभी कल ही फिर बढा दिये...
शहरों में और महानगरों में एक आम आदमी के लिये अपना एक घर खरीद पाना असंभव सा हो गया है

अभी कुछ समय पहले सुनील जी ने सपनों पर एक लेख लिखा था...आप बताइये कोई कैसे करेगा अपने सपने पूरे जब रोटी, कपडा और मकान जैसी मूलभूत सुविधाएं ही आम इंसान के लिये मुश्किल हो रही है.६० रुपये की न्यूनतम मजदूरी तो छोडिये, क्या १००-१२५ रुपये रोज कमाने वाला एक आदमी भी इस महँगाई में ४ लोगों के परिवार का खर्च ठीक से चला सकता है?
सपनों के ऊपर आगे और लिखूंगा, लेकिन यह तो सोंचने की बात है ही कि हमारे अखबार पत्रिकाएं और न्यूज चैनल इन सब खबरों को अपनी सुर्खियाँ क्यों नही बन्नते, जबकि ये खबरें आम आदमी से सबसे ज्यादा सरोकार रखती हैं...