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Showing posts from September, 2005

ओणम

आज सुबह से(बल्कि कल रात से ही) मस्त मौसम बना हुआ है, खूब बारिश हो रही है भोपाल में, और कल ही अखबार में पढा था कि "मौसम विभाग के अनुसार शहर से मानसून विदा ले रहा है"...धन्य है मौसम विभाग. वही दूसरी और मेरे गृह राज्य राजस्थान में इस साल फिर अकाल की आशंका है.मेरा गाँव(sorry कस्बा) यहाँ से बस १७० किलोमीटर है..पर इंद्रदेवता वहाँ जाने को तैयार ही नही.... आज ओणम का त्यौहार है. उत्तर भारत में तो किसी को इसका पता भी नही होता , लेकिन दक्षिण में और खासतौर से केरल में यह बडी धूम से मनाया जाता है. मुझे इसलिये याद रह(आ)जाता है क्योंकि केरल के कई स्कूली मित्रों से अभी भी सम्पर्क में हूँ(इन्टरनेट की कृपा से) मैने भी अपनी जिन्दगी के दो ओणम केरल में ही बिताए हैं. जवाहर नवोदय विद्यालय,मलमपुझा,केरल में जब नवीं और दसवीं की पढाई की. ओणम पर स्कूल में ३-४ दिन का अवकाश हुआ करता था और सभी स्थानीय छात्र अपने अपने घरों पर जाया करते थे.अब चूँकि हम राजस्थानी छात्रों को घर भेज पाना सम्भव नही था(६ दिन तो आने जाने के लिये चाहिये)अतः हमें भी अपने स्थानीय मित्रों के साथ उन्ही के घरों पर भेज दिय जाता था.(हाँ होली…

हिन्दी दिवस

आज हिन्दी दिवस था.पिछले १५ दिन से "हिन्दी पखवाडा" के तहत कई प्रतियोगिताएं चल रही थी. इन प्रतियोगिताओं मे ज्यादतर स्टाफ सदस्य ही हिस्सा लेते हैं, हम छात्रों में से सिर्फ मैं और भास्कर...और कोई नही...शायद समय के कमी या रुचि की कमी? तो आज समापन समारोह था..मुख्य अतिथि थे, वरिष्ठ साहित्यकार पद्म श्री रमेश चन्द्र शाह.वैसे भोपाल साहित्यकारों, कवियों एवं कलाकारों का शहर है.भारत भवन में यहाँ नियमित रूप से प्रख्यात हस्तियों के कार्यक्रम होते रहते हैं, लेकिन हमारा दुर्भाग्य, हम आज तक भारत भवन नही जा पाए, रस्ता तक नही मालूम.वही,समय की कमी,थोडा आलस्य भी... पिछले साल जरूर हमने शायर मंजूर एहतेशाम साहब को संस्थान बुलाया था, लेकिन "पब्लिक" यानि छात्रों को जुटाने में पसीने आ गये थे...और हाँ पिछले हिन्दी दिवस पर डाक्टर विजय बहादुर सिंह मुख्य अतिथि थे तो उनको सुनने का मौका मिल गया था. तो आज शाह साहब की जो बात मुझे सबसे ज्यादा पसंद आयी वो उनका ये कथन कि अच्छी कविता लिखने के लिये अच्छा गद्य लिख पाना बहुत जरूरी है. उनके व्याख्यान का काफी हिस्सा इसी बात के इर्द-गिर्द था बात हमारे दिल में ब…

...तो क्या

कल उषनीश ने एक शेर सुनाया था...क्या था वो तो मैं भूल गया पर अन्तिम दो शब्द याद रह गये जो थे...तो क्या..आज क्लास में बैठे बैठे इसी पर तुकबन्दी की...

तुम क्लास जरूर आ जाया करो,
यहाँ आकर फिर सो जाओ तो क्या?

प्रोफेसर जी कुछ पूँछ लें गर,
बतलाओ या ना बतलाओ तो क्या?

सबसे पीछे की कुर्सी भली,
वहाँ चुप बैठो या बतियाओ तो क्या?

जब क्लास में हों नौ कन्याएं,
बस देख उन्हें मुस्काओ तो क्या?

exam में जब कुछ लिख ना सको,
फिर इधर उधर तकियाओ तो क्या?

जी भर कर फिर फन्डे फेंको,
परिणाम देख गरियाओ तो क्या?

शिक्षक दिवस

आज शिक्षक दिवस है...सभी गुरुजनों को इस अवसर पर नमन्, जैसा कि जीतू जी ने भी कहा है..आज इस मुकाम पे नही होते..अगर आप सब नही होते.... अब सबसे पहले तो दैनिक भास्कर की इस खबर पर नजर डालें.....और फिर इन तुकबन्दियों पर... 1).जनगणना भी वो करें,पोलियो दवा भी पिलाएं, इससे भी कुछ समय बचे, तो "मिड डे मील" पकाएं, कोई हमें बताए, बडा यह प्रश्न है भारी, शिक्षक "शिक्षक" है, या फिर बाबू सरकारी? 2). गुरुजी की जरुरत नही ,कम्प्यूटर क्लास चलाएंगे, घर बैठे अब शिक्षार्थी के, ज्ञान की प्यास बुझाएंगे. कम्प्यूटर नही पकडे कान , कम्प्यूटर नही मारे बेंत, क्या देना है क्या नही, कम्प्यूटर नही जाने भेद. यहाँ मिलेगा विकी, यही पर "बाबा देसी", ज्ञान मिलेगा वैसा, जिसकी रही भावना जैसी.
3). कालेज कभी गया नही,Exam में सो गया, ट्यूशन कभी छोडी नही, चाहे जो हो गया, परिणाम जब आए, सब बोले चमत्कार हो गया, वो देखो..पप्पू पास हो गया.
इस खबर को सुन कर एक बहुत तेज और हकीकत के जैसी खबरें देने वाले TV चैनल की संवाददायिनी फुर्ती से पप्पु के पास पहुँची(भई..पप्पू ने एकदम "नासा की परीक्षा में टाप" करने जैसा काम किया…

तुम और मैं

यह कविता मुझे बहुत दिन पहले mail forward मै प्राप्त हुई थी..मुझे बहुत पसंद आई और इसे पढ कर मैं खूब हँसा. क्योंकि तब मैं हिन्दी ब्लोग नही लिखता था, अतः मैने इसे अपने अन्ग्रेजी ब्लोग पर जस का तस चिपका दिया था...आज सोंचा के क्यों न यहा भी इसे चिपका ही दिया जाए.इसके रचियता का नाम मालूम नही है..अगर आप जानते हों तो कृपया बताएं..

मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम MA फर्स्ट डिविजन हो, मैं हुआ मेट्रिक फेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम फौजी अफसर की बेटी , मैं तो किसान का बेटा हूँ
तुम रबडी खीर मलाई हो, मै तो सत्तू सपरेटा हूँ
तुम AC घर में रहती हो, मैं पेड के नीचे लेटा हूँ
तुम नयी मारुती लगती हो, मै स्कूटर लम्ब्रेटा हूँ
इस कदर अगर हम छुप छुप कर, आपस में प्यार बढाएंगे
तो एक रोज तेरे डेडी, अमरीश पुरी बन जाएंगे

सब हड्डी पसली तोड मुझे वो भिजव देंगे जेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम अरब देश की घोडी हो, मैं हूँ गदहे की नाल प्रिये.
तुम दीवाली का बोनस हो, मै भूखों …