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Showing posts from December, 2005

सुर्खियों में....

IISc पर हमला
भारतीय विज्ञान संस्थान पर परसों रात हुए आतंकवादी हमले को देश् की बौद्धिक संपदा पर हमले के रूप में देखा जा सकता है ...साथ ही ये इस और भी संकेत करता है, कि आतंकवादी अब राजनैतिक और धर्मिक निशानों के अलावा अन्य निशाने भी ढूंढ रहे हैं...
आज विश्व में भारतीय वैज्ञानिकों, प्रबंधकों और तकनीकी विशेषज्ञों को जो सम्मान प्रप्त है, वो IISc जैसे संस्थानों की ही देन है, अतः कोई आश्चर्य नही कि आतंकवादी इन्हें निशाना बनाने का प्रयास करें..
IIT दिल्ली के प्रो.पुरी को श्रृद्धांजली


आमिर खान की शादी
आमिर खान और किरण राव की शादी मीडिया की सुर्खियाँ बनी हुई है, पर एक और शख्स जो इस शादी से सबसे ज्यदा आहत(या प्रभावित) हुआ होगा, उस पर किसी का ध्यान नही गया, आमिर की पहली बीवी, रीना. उन्होने आमिर से तब शादी की थी, जब आमिर सुपरस्टार नही थे, और फिल्मी दुनिया में उनके पैर जमें नही थे, लगान के निर्माण के समय भी रीना ने आमिर की कम्पनी को पूरी तरह संभाला था.दोनो का तलाक कुछ समय पहले हुआ. बडा आश्चर्य होता है कि कोई कैसे १६ साल एक साथ रहने के बाद एक दूसरे को छोड सकता है.
अभी २-३ दिन पहले दैनिक भास्कर में इस पर जय…

वर्ष २००५ में पढी गई पुस्तकें

आज अवलोकन-२००५ के अंतर्गत, पाठ्यक्रम के अतिरिक्त वे पुस्तकें जिन पर हाथ साफ करने में सफल हुआ...
Life of Pi byYann MartelDa vinci Code byDan Brawnगुनाहों का देवता कृतिधर्मवीर भारतीगोरा कृतिरवीन्द्र नाथ टैगोरFour Blind Mice byJames Patterson*Harry Potter & Half Blood Prince byJ K RowlingState of Fear byMichale CrichtoneDeception Point byDan Brawn*Angels & Damons byDan Brawn*Digital Fortress byDan BrawnA Thousand Suns byDominique LappireO Jerusalam byDominique Lappire & Larry CollinsDevil's Alternative byFredrick Forsythमेरा गाँव, मेरा तीर्थ कृतिअन्ना हज़ारेOut of my Confort Zone bySteve WaughSony byJohn NathanRage byJonathan Killermanआखिरी दो किताबें अभी चल रही हैं, २-४ दिन में खतम हो जायेंगी.
जिन किताबों के आगे * चिन्ह लगा हुआ है उनकी सिर्फ Soft Copy उपलब्ध थी...पर चूँकि पढना जरूरी था...सो दो-दो तीन-तीन दिन तक कम्प्यूटर जी के साअमने आँखें गडाए बैठे रहे ;)
उम्मीद करता हूँ कि २००६ के लिये ये सूची और भी लम्बी होगी

अवलोकन-२००५

वर्ष २००५ बीत रहा है...आखिरी ८-९ दिन बचे है, और जिधर देखो उधर अलविदा २००५ का शोर सुनाई दे रहा है.मैंने सोंचा क्यों न खुद भी २००५ में अपनी आप बीती का अवलोकन किया जाये और देखा जाये कि कैसे बीता ये साल...

सबसे पहली बात तो, यह साल सही मायनों में मेरे लिये घुमंतू साल रहा, इस साल जितना घूमा उतना पहले कभी नही. झारखंड, उडीसा, आंद्रप्रदेश ,मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और खुद अपने राजस्थान के कई हिस्से नाप डाले.
साल शुरू हुआ, झारखंड में चाईबासा के एक वन विभाग के विश्राम गृह से, जहाँ की बिजली, बिल न भरे जाने के कारण काट दी गई थी, याने ३१ दिसंबर २००४ की रात को(और १ जनवरी २००५ की सुबह) हम निपट अंधेरे में थे...फिर एक हफ्ता राँची रह कर वापस भोपाल में तीसरा Term पढाई की. अप्रेल मध्य से फिर निकले Organisational Training-I के लिये. उडीसा के ७-८ जिले और मध्यप्रदेश में शहडोल. फिर जुलाई से चौथा Term और फिर सितम्बर अंत में Organisational Training-II के लिये, पहले उदयपुर और आसपास, फिर राँची, भुवनेश्वर, हैदराबाद, रायपुर, गुजरात आदि....
धन्यवाद IIFM इन सब जगहों और यहाँ के लोगों को नजदीक से देखने का मौका देने के लिये, …

अपनी 'खोल' से बाहर...

बहुत दिनों से मैने कोई किताब नही पढी. २ महीने से बाहर होने की वजह से समय भी नही मिल पाता था...बीच में पाउलो कोहेलो की "द अल्केमिस्ट" पढी थी, पर वो मैने पहले ही पढी हुई थी...इसके अलावा सुरेन्द्र मोहन पाठक के एक्-दो उपन्यास ट्रेन में पढे थे, पर कोई serious reading नही हुई थी.

कल स्टीव वा की आत्मकथा,"आउट आफ माय कम्फ़र्ट जोन" (Out of My comfort Zone) हाथ लगी है, उसे निपटा रहा हूँ, इस सप्ताह में खत्म करने का मानस बनाया है.हिन्दी में शायद इसका मतलब होगा, "अपने सुरक्षा कवच(या 'खोल') से बाहर"...

आमुख की दो पंक्तियाँ काफी अच्छी लगी,यहा चिपका रहा हूँ
"....I have come to learn that life wouldn't be as enjoyable if it was always easy, and that personal growth comes from having to move out of your comfort zone...."

मैने भी कई बार अनुभव किया है कि इस Comfort Zone से एक बार निकलना काफी मुश्किल होता है, किन्तु यदि निकल गये, तो काम मे बडा मजा आता है और सफलता की संभावना भी ज्यादा रहती है....लेकिन इस जंजीर को तोडना होता बडा दुष्कर है...
लगता है, समय खराब चल रहा है...पहले मोबाइल खोया था, उसके झटके से उबर कर अब नया लेने का विचार कर रहा था, कि कल कम्प्यूटर का मदरबोर्ड "उड" गया...यानि दो-ढाई हजार का खर्च फिर सर पे...वारंटी भी दो महीने पहले निकल चुकी है...:(..सारा वित्तीय इंतजाम गडबड हो गया .
खैर, वापस IIFM पहुँच गये हैं, फिर वही पुरानी दिनचर्या और जिन्दगी...ऊपर से इस बार शेड्यूल बहुत 'टाइट' है...