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पता परिवर्तन सूचना

सभी खास-ओ-आम को सूचित किया जाता है कि अपनी दुकान नई जगह शिफ़्ट हो गई है...नया पता ये रहा....सिर्फ़ एक क्लिक की दूरी पर..:)
ये दुकान भी चलती रहेगी..पर हो सकता है माल यहां तक पहुंचने में कभी कभी वक्त लग जाये...
नारद जी को अलग से चिट्ठी लिख कर सूचित कर दिया गया है..
जब भी वक्त मिले...पधारियेगा...हम भी कोशिश करेंगे कि दुकान नियमित रूप से चलती/खुलती रहे और वहां माल की आपूर्ती बनी रहे..
सधन्यवाद

२१ वीं अनुगूंज - चुटकुले

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हर सफ़ल पुरुष के पीछे एक महिला का योगदान होता है
हर असफ़ल पुरुष ले पीछे....कई महिलाओं का

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अगर आपके पिताजी गरीब हैं तो ये आपकी बदकिस्मती है,
अगर आपके ससुर गरीब हैं तो ये आपकी बेवकूफ़ी है.

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आपका भविष्य आपके सपनों पर निर्भर करता है.
ठीक है..मैं चला सोने.

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खुदी को कर बुलन्द इतना और इतनी ऊंचाई पर पहुंच जा,
कि खुदा खुद तुझ से पूंछे.....
अबे गधे, नीचे कैसे उतरेगा...

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खिडकी खुली, जुल्फ़ें बिखरी,
दिल ने कहा दिलदार निकला.
पर हाय रे मेरी फ़ूटी किस्मत,
नहाया हुआ सरदार निकला.

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कहते हैं, इश्क में नींद उड जाती है.
कोई हमसे भी इश्क कर ले.......
कम्बख्त नींद बहुत आती है

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जिन्दगी में तुम बहुत आगे जाओगे.
क्योंकि जहां भी तुम जाओगे,लोग कहेंगे...
चल बे,आगे चल.

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घडी ब…

अपना भी एक साल पूरा !!!

अभी अभी ध्यान गया कि कल, ९ जुलाई २००६ को हमारे इस चिट्ठे ने भी अपनी उम्र का एक वर्ष पूरा कर लिया.

जैसी कि रीत है, इस अवसर पर पुनरावलोकन करने की कोशिश की जाती है, तो पहली और महत्वपूर्ण बात तो ये कि इस एक वर्ष में काफ़ी कुछ सीखा. थोडा बहुत लिखा, और सबसे रसभरी बात, काफ़ी कुछ पढने को मिला.

दूसरी बात ये कि चिट्ठों के माध्यम से काफ़ी लोगों को जाना, काफ़ी मित्र बने. सागर जी से कुछ ही दिन पहले सक्षात भी मिल लिये....सही मायनों में पहली बार महसूस किया कि अंतरजाल नये लोगों को मिलाता है.हमारे सहकर्मी हेमनाथन से भी हमारा पहला परिचय ब्लोग(अंग्रेजी वाले) के माध्यम से ही हुआ था.

लिखने की शुरुआत हमने कुछ कविताओं से की थी, लेकिन धीरे धीरे अपनी बकर की भडास भी यहीं निकालने लगे. वैसे लिखने में हमने कोई तीर नही मारे, लेकिन एक बात है कि चिट्ठा लेखन से हमारे सोंचने के तरीके में बदलाव जरूर आया (वैसे सोंचते हम पहले भी थे)..पर अब एक आदत ये हो गई है कि किसी भी घटना-दुर्घटना को देखते हैं तो उसके २-३ पहलू देख लेते हैं..और ये जरूर सोंचते हैं कि क्या इस बात को अपने चिट्ठे पर डाला जा सकता है...यदि हां तो कैसे(ये अलग बात है …

किरकिट पर कुछ........

भारत ने वेस्टइंडीज में आखिरकार ३५ साल बाद सीरिज जीत ही ली....अनिल कुंबले ने २३ विकेट लेकर एक बार फ़िर साबित किया कि वे अभी भी भारतीय टीम की जान हैं...और द्रविड के बारे में तो कुछ कहने की जरूरत ही नही....a true leader....leading by example....मुझे आश्चर्य नही होगा अगर जल्द ही कोई Management School द्रविड को लेकर Leadership पर कोई Case Study बना दे...

भारतीय टीम को शुभकामनाएं...वैसे सीरिज की विजय फ़ुटबाल के हो-हल्ले में दब कर रह गई....और इतनी चर्चा इसे शायद नही मिली जितनी अन्यथा मिलती...

खैर, इस लेख को लिखने का मेरा म‍ंतव्य सिर्फ़ शुभकामना देना भर नही था....कुछ और बात थी जिसने मेरा ध्यान खींचा ....भारतीय टीम का विदेशी धरती पर जीत का अकाल वैसे तो हमेशा चर्चा का मुद्दा रहता था...लेकिन आज मैने रेडिफ़ पर अब तक की भारतीय जीतों(उपमहाद्वीप के बाहर) की सूची देखी....
अब तक भारत ने उपमहाद्वीप के बाहर १९ टेस्ट जीते हैं.....

मौटे तौर पर अगर में इन विजयों को समय के हिसाब से बांटूं तो वो इस तरह की तस्वीर दिखाती है

सन ६५ से ७५ (१० साल) - ७ टेस्ट (३७ %)
सन ७५ से ८६ (११ साल) - ५ टेस्ट (२६ %)
सन …

....कारवाँ बनता गया.

नारद के पुरालेख वाले हिस्से पर नजर डालेंगे तो पायेंगे कि २००६ में अभी तक हिंदी चिट्ठों पर करीब 3000 प्रविष्टियाँ लिखी जा चुकी हैं...खुशी की बात यह है कि २००५ के पूरे साल में जितना लिखा गया था, उससे ज्यादा २००६ की पहली छमाही में ही छाप दिया गया,(यह संख्या सिर्फ उन चिट्ठों की है जिनकी खबर नारद को है...वास्तविकता में यह इससे काफी ज्यादा हो सकती है) और यह सही मायनों में हिन्दी ब्लागमंडल(और अन्तर्जाल)पर हिन्दी के प्रसार का द्योतक है...आशा करते हैं कि २००६ की दूसरी छमाही में हम इससे भी दुगुना-तिगुना-चौगुना लिखेंगे...

साथ ही मैं यह भी आशा करता हूँ कि आने वाले समय में हिन्दी चिट्ठों में विविधता बढती जायेगी....जो कि इन्हे समृद्ध बनाने के लिये काफी जरूरी है...करीब साल भर पहले तक अधिकतर चिट्ठे साहित्यिक हुआ करते थे...मैने खुद अपने चिट्ठे की शुरुआत अपने कुछ कविताओं से की थी...जिन्हे कोई नही पढता था...लेकिन अब काफी बदलाव आ रहा है साहित्यिक के साथ तकनीकीज्ञान , खबरी, धार्मिक चिट्ठे भी दिखाई दे रहे हैं...हाँ टोने-टोटके की आलोचना और इसके बंद किये जाने का मुझे दुख हुआ...

परिचर्चा के आने से लोगों के बीच …

राकेश रोशन की फिल्में

रितिक/राकेश रोशन की नई फिल्म "कृष" के काफी अच्छी से लेकर बहुत खराब समीक्षाएं सुन/पढ चुका हूं..अभी देखी नही है सो अपनी राय तो नही दे सकता, लेकिन राकेश रोशन निर्देशित फिल्मों(पिछली ४-५)को देखें..और जरा गौर करें तो पायेंगे कि कुछ आधारभूत बातें उनकी हर फिल्म में एक जैसी होंगी..जैसे
फिल्म के पहले आधे भाग में हीरो बिल्कुल सीधा साधा होगा...हीरो-हीरोइन मिलेंगे..इश्क-विश्क होगा, गाने गाये जायेंगे...और आप सोंचेंगे...."ये कहाँ आ गये हम..."
मध्यांतर के ठीक पहले, फिल्म में एक अच्छा सा पेंच (twist) दे दिया जायेगा..और यहाँ से फिल्म एकदम रोमांचक मोड ले लेगी..अर दर्शक फिल्म से बंधा हुआ रह जायेगा..
अच्छे गाने/लोकेशन्स/हीरो/हीरोइन तो लगभग हर निर्देशक उपलब्ध करा लेता है, लेकिन आजकल की लगभग सारी फिल्मों में और खासकर रोमांच फिल्मों में सबसे बडी समस्या यहीं आती है, कि पहले हाफ में तो फिल्म ठीक ठाक चलती है,लेकिन मध्यांतर के बाद निर्देशक फिल्म पर अपनी पकड खो देता है...और अंत आते आते तो ऐसा लगता है कि जबरन फिल्म को खत्म किया जा रहा है...
अगर कोई निर्देशक फिल्मे के दूसरे भाग पर पकड मजबूत रखे...…

सुर्खियों से हट कर

आज आरक्षण,महाजन,आमिर खान,लाभ का पद,क्रिकेट इत्यादि के अलावा कुछ बातें...

क्या आपको गेहूँ के भाव पता हैं?....
पिछले कुछ दिनों(महीनों)से १० रुपये प्रति किलो से १८-२० रुपये प्रति किलो तक चल रहे हैं
सरकार देश के किसानों से ७ रुपये किलो गेहूँ खरीद रही है, और दूसरे देशों से १० रुपये किलो तक में आयत कर रही है
उडद मूँग चना तुवर आदि दालों के भाव ४६ से ६० रुपये प्रति किलो जा पहुँचे हैं..
शकर २०-२१ रुपये किलो हो गई है
सब्जियों के दाम भी कमोबेश आसमान छू रहे हैं (वैसे मैने बहुत दिन से खरीदी नही)
चांदी १८-१९००० रुपये प्रति किलो....साल डेढ साल पहले तक ८-१० हजार रुपये प्रति किलो थी
सोना ९-९५०० रुपये प्रति दस ग्राम...साल डेढ साल पहले तक ६-७००० रुपये प्रति दस ग्राम था
रेलवे स्टेशनों पर सार्वजनिक नलों में पानी नही मिलता हर जगह् बोतलबंद पानी जो उपलब्ध है... पेट्रोल और डीजल के दाम के बारे में कुछ ना कहना ही बेहतर है....अभी कल ही फिर बढा दिये...
शहरों में और महानगरों में एक आम आदमी के लिये अपना एक घर खरीद पाना असंभव सा हो गया है

अभी कुछ समय पहले सुनील जी ने सपनों पर एक लेख लिखा था...आप बताइये कोई कैसे करेगा अपने सपने…

हैदराबाद हिंदी ब्लागर मीट...

यह कोई बहुत बडी और बहुत योजनाबद्ध ब्लागरमीट नही थी,वैसे भी हैदराबाद से हिंदी में लिखने वाले बहुत कम दिखाई देते हैं...
तो हुआ यों कि हिंदी ब्लाग जगत में करीब ३ महीने पहले दस्तक देने वाले, और वर्तमान में काफी सक्रिय रूप से लिखने वाले (खासकर परिचर्चा में) सागर जी से करीब १५ दिन पहले जी-मेल पर बात हुई थी...उन्होने तत्काल ही घर आने का, उस दिन रात को साथ खाना खाने का और फिर रात को घर पर होने वाले जागरण में शामिल होने का निमंत्रण दे डाला था...पर उस समय नौकरी से फुरसत नही थी सो उनसे माफी मांग ली थी और पता ले लिया था...साथ ही यह भी कि अब किसी भी दिन घूमते-घामते आपके दर तक पहुंच जाऊंगा

तो कल दोपहर में भोजन के बाद ...इसी तरह घूमते हुए मैने अपने आप को सिकंदराबाद जाने वाली बस में पाया, वेस्ट मारदपल्ली जाने के लिये, जहां इनका सायबर केफे है...बस से उतर कर करीब आधे घंटे घूमते भटकते हुए, लोगों से रास्ता पूंछते हुए आखिर हम जा ही पहुंचे 'मकडियों के जाले' पर (अजी Spider, the WEB, जो इनके केफे का नाम है)

काफी गर्मजोशी से मिले..चाय पानी ठण्डा आदि कि पूंछताछ हुई, पानी मैने लिया पर चाय और ठंडे से हाथ …

जो मैने देखा

अपनी पिछली पोस्ट में मैने मानव समाज में हो रहे परिवर्तन की गति पर चर्चा की थी... सौभाग्य से (या दुर्भाग्य से) मैं जिस काल खंड में बडा हुआ हूं उसमें ये परिवर्तन काफी तेजी से हो रहे हैं...

जब थोडा समझने लगा..करीब १०-११ साल की उम्र से...तब भारत आर्थिक उदारीकरण के युग में प्रवेश करने वाला था...और देखते देखते १५-१६ सालों में कितना कुछ बदल गया..

आज वो कुछ चीजें जो मेरे साथ बडी हुई और बदलीं...(मेरी लम्बाई,चश्मे के नम्बर, और दाढी-मूंछों के अलावा :) ) लगभग सभी बातें भारतीय समाज से ताल्लुक रखती हैं....मेरे हमउम्र और भी लोगों ने इन्हे महसूस किया होगा

मैने क्रिकेट को जुनून और सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान बनते देखा है

मैने शाहरुख खान को 'सर्कस'से निकल कर बॉलीवुड का 'बादशाह'बनते देखा है

मैने दूरदर्शन की साप्ताहिक फिल्म का बेसब्री से इंतजार किया है, और ५० चेनलों में भी कोई एक कार्यक्रम ठीक से ना देख पाने की बेबसी को भी महसूस किया है

मैने अपने घर फोन लगाने के लिये STD Booths पर ४-४ घन्टे बिताये है (हमेशा लाइन खराब मिलती थी) और मोबाइल से सुदूर गावों से घर पे बात की है

मैने Black &…

परिवर्तन

परिवर्तन ही सतत है...Only Change is Constant..

यह बात कई जगहों पर कही और सुनी जाती है और लगभग हर पीढी,देश और काल के परिपेक्ष्य में सटीक भी बैठती है...लेकिन जो चीज़ ध्यान देने वाली है वो है परिवर्तन की दर...The rate of Change...जिस गति से परिवर्तन हो रहे हैं, क्या मानव उसके लिये तैयार है?

एल्विन टॉफ्लर अपनी पुस्तक त्रयी Future Shock, Power Shift और Third Wave में इस बात को बखूबी इंगित करते हैं...

जरा सोंचिये...ज्यादा दूर न जाकर सिर्फ पिछले २ हज़ार सालों का इतिहास उठाते हैं...करीब १६०० इस्वी तक मानव समाज पूर्णतः कृषि आधारित था...अगले मात्र ३०० सालों में औद्यौगिक क्रांति ने पूरे विश्व में पैर पसार लिये. कृषि आधारित समाज को उद्योग आधरित समाज बनने में मात्र ३०० साल...??
अगर मानव उत्पत्ति का इतिहास देखा जाये,तो ३०० साल मानव जाति के तो संपूर्ण इतिहास के लिये एक पल के बराबर भी नहीं हैं...

इसकी तुलना किजिये इस बात से,कि जब मानव अपने वर्तमान स्वरूप में आया (होमो सेपियन्स, जो सीधा चल सकते थे....सोंच सकते थे..आदि आदि)..तो उसे लाखो वर्ष खानाबदोश से कृषि आधारित समाज बनने में लगे...कृषि आधारित समाज भी कई ह…

रफ्तार की गहराई

अभी कुछ दिन पहले इन्टरनेट पर हिन्दी के प्रचार प्रसार में आने वाली समस्याओं पर एक लेख पढा था, हिन्दी सर्च इंजन के बारे में भी वहाँ कुछ लिखा था, और रफ्तार के बारे में भी...रफ्तार के बारे में बहुत दिन पहले सुना था पर उसे आजमाया नही था...इस लेख को पढ कर सोंचा कि क्यों ना आजमाया जाये...पर नतीजा बडा कष्टप्रद निकला...

सबसे पहले हमने हमारा नाम वहाँ डाल कर देखा , गूगल महोदय हमारे नाम को लेकर करीब ३०० परिणाम बताते हैं, जिनमे सबसे पहले हमारा ब्लोग आता है, रफ्तार की रफ्तार सिर्फ ४० तक ही पहुँच पाई :(...बहुत दुखः हुआ, फिर सोंचा कि हम तो आम जनता हैं, हमारा नाम इतना महत्वपूर्ण भी नही है, शायद रफ्तार ने शामिल करना ही उचित नही समझा हो, तो 'भारत' को लेकर यही प्रयोग आजमाया... भारत शब्द को लेकर रफ्तार कुछ १८००० परिणाम दिखाता है, यही शब्द जब मै गूगल महोदय के पास लेकर गया तो उन्होने ९,९२,००० परिणाम दिखाये...याने ५० गुना फर्क !!!

दिल तो बहुत दुखा, पर कुछ कर नही सकते थे...सोंचा के क्यों न थोडी समाज सेवा की जाये, मुख पृष्ठ पर नीचे एक लिंक थी, 'हिन्दी वेब साइट बताएं'..हमने सोंचा कि अपना ब्लोग तो …

अपने अपने फर्ज

विदेशों में स्वेच्छा से पैसा कमाने गये भारतीयों की सुरक्षा का जिम्मा सरकार ले या ना ले, इस पर काफी बहस चल रही है...नुक्ताचीनी में इस पर लेख लिखा गया, युगल ने अपने चिट्ठे में इस पर एक सवाल छोडा, और हिन्दिनी पर भी इस बारे में चर्चा हुई..

मैं कुछ प्रश्न उठाना चाहूंगा...

जब कोई भारतीय(या अनिवासी भरतीय)विदेश नें जाकर नाम और शोहरत कमाता है, तो क्या हम अपने गाल बजाकर खुश नही होते?

क्या हम बाहर जाकर बसे भारतीय से यह अपेक्षा नही करते कि वो भारत में निवेश करे, भारत कि उन्नति में योगदान दे...?

क्यों हम बडे बडे सम्मेलन आयोजित करते हैं जिनमें बाहर जाकर बसे भारतीयों से देश की तरक्की में हाथ बंटाने की अपील की जाती है?

अब अगर देश यह उम्मीद रखता है, कि देश का नागरिक(या अनिवासी नागरिक), देश के प्रति अपना फर्ज समझे, तो क्या फिर देश और सरकार का यह फर्ज नही है कि उन्ही नागरिकों की सुरक्षा और हिफाजत के लिये वो दुनिया की किसी भी ताकत टकरा जाये और इतना कडा और कूटनीतिक रुख अख्तियार करे कि आगे कोई इस तरह की हरकत करने की हिमाकत ना करे ?

क्या हमारी आज की स्थिति पूर्व में की गयी कूटनीतिक भूलों का परिणाम नही है? अब यह…

मिसाल

हरा भरा ठूंठ.
ताज़िन्दग़ी ढोया हुआ,
थोडा सच, थोडा झूठ.

बोलता पानी.
बरसों से चुप,
खामोश जुबां की कहानी

चूल्हे में राख.
आक्रोशित मन की,
बुझी हुई आग.

टूटा फूटा सामान.
बरसों से संजोये हुए,
बिखरे हुए अरमान.

तपती हुई रेत,
अकाल की मार से,
पिचका हुआ पेट.

मिसालें हैं कई.
कुछ कही, कुछ अनकही,
कभी ग़लत, कभी सही.

कुछ शब्द बन कर निकलीं,
कुछ आँसू बन कर बही.

थोडा बहुत कह दिया,
काफी कुछ दिल में ही रही.

# नितिन - २८ अप्रेल २००६

कैसा होगा मौसम...?

समझ नही आ रहा इसे खुश खबरी मानें या दुखखबरी, मौसम विभाग ने फरमाया है कि इस साल मानसून सामन्य से कम रहेगा...
भई है तो दुख खबरी ही, क्योंकि अपने यहाँ में हिन्दुस्तान तो पूरा बाजार ही मानसून पे टिका हुआ है...तो फिर खुशखबरी क्यों...वो इसलिये,कि जरा बताइये पिछली बार कब ऐसा हुआ था कि मौसम वालों ने सटीक भविष्यवाणी की थी?अगर कहते हैं कि मौसम शुष्क रहेगा तो मतलब होता है कि छाता लेकर ही घर से निकलना...बारिश हो सकती है...और अगर बूंदाबांदी के आसार बताए, तो समझिये कि बिन्दास धूप निकलेगी...बिल्कुल बेफिक्र रहिये...
एक बात और है...इनका सामान्यता का पैमाना भी थोडा टेढा होता है...अगर किसी एक भाग में १०० सेमी बरसात(याने बाढ) हुई और किसी एक में ७८ सेमी (याने कम) तो इनका औसत हो गया ८९ सेमी(जो कि सामन्य है)...तो फिर क्या फिकर है...?
याने सामान्य से कम मानसून को अभी तो हमारा (Un)Common sense मान नही रहा है
और फिर राम जी के आगे किसी की चली है भला......

एक अदद मकान

पिछले ८-१० दिन से नवाबों के शहर हैदराबाद में हूं...रोजी रोटी, याने नौकरी, घर से बहुत दूर खींच लायी है.नया शहर , नयी नौकरी और नये लोग...अभी हमारे सामने सबसे बडी समस्या है, नया घर ढूंढने की, फिलहाल एक होटल में रह रहा हूं पर ज्यादा दिन तो होटल में नही रह सकते ना..और कब तक अनिकेतन रहेंगे..

कल शनिवार, याने वीकेंड था, और पहला दिन, जब हम फ्री थे...तो निकल पडे फ्लेट/मकान ढूंढने...
काफी धक्के खाये पर अभी कुछ मिला तो नही, पर कसम से...एक आध जगह तो क्या रोचक वाकयात हुए...
एक जगह..To-Let का बोर्ड देख कर घंटी बजायी...
एक छोटी लडकी ने, खिडकी में से ही पूंछा..."क्या है?"
"जी वो मकान..."
कुछ पूंछने भीतर गयी...फिर आयी,
"हिन्दू, या मुस्लिम?"
"जी हिन्दू"
फिर कुछ पूंछने भीतर गयी...फिर आयी
"वेज्ज, या नोन वेज्ज...?"
मैं बोला...मै वेज्ज, मेरा दोस्त नोन वेज्ज
अब तक थोडा गुस्सा आने लगा था, पर मकान तो चहिये था...
वो लडकी फिर भीतर गयी, और इस बार एक बुजुर्ग महिला साथ आयी...
"फेमिली, या बेच्चलर..?"
"जी बेच्चलर.."
"नही जी, हम तो सिर्फ फेमिली को ही देते है..…

बडे दिनों के बाद

काफी दिनों बाद यह लिख पा रहा हूँ...पिछले एक महीने से घर पर था...यानी internet और cyberspace से एकदम दूर...
अभी बहुत देर से पुराने चिट्ठे पढने का प्रयास कर रहा हू...इतना कुछ लिखा गया है यहा पर कि कम से कम ३-४ दिन तो लगेंगे हि सब कुछ पढने में..
कल यहाँ चेन्नई में अपनी पहली नौकरी शुरू की...थोडे दिनों में काफी कुछ बदल जायेगा...IIFM पीछे छूट गया, दोस्त छूट गये..नये लोग नया काम
कालेज की बेफिक्री के दिन तो बहुत ही याद आयेंगे...
खैर फिर एक बार , नियमित रूप से लिखने की कोशिश करूंगा

क्या हम लातों के भूत हैं?

अभी इंडिया टुडे के ताजा अंक में एक सर्वेक्षण के परिणाम देख रहा था. क़ौन सा पूर्व प्रधानमंत्री आज की समस्याओं से जूझने में सर्वाधिक योग्य है...?
?४१% मत इंदिरा जी को...एसे २-४ सर्वेक्षण पहले भी देख चुका हूं, इंदिरा गांधी को हमेशा सर्वाधिक मत प्राप्त होते हैं...
ऐसा क्यों है जबकि उनके साथ भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय यनि 'आपातकाल' जुडा हुआ है....., किंन्तु कई लोग तो आपातकाल को देश का सबसे अच्छा समय बताते है...वजह, बस-ट्रेन समय पर चलती थें, कोई रिश्वत लेने की हिम्मत नही कर सकता थ, तुरत फैसले होते थे..आदि आदि...
इसी प्रकार मैने कई बुजुर्गों के मुह से मैने अंग्रेज शासन की भी बहुत प्रशंसा सुनी है (आज के हालात से तुलना करते हुए)...सख्ती वहां भी बहुत थी..

क्या ये दोनों उद्धरण इस बात की ओर इंगित करते हैं कि हम लोग सिर्फ तभी सीधे चल सकते है जब हम पर डंडे की सख्ती की जाये...देसी भाषा में...क्या हम लातों के भूत हैं?...जब तक सजा होने का या पकडे जाने का डर नही हो, हम किसी भी प्रकार के नियम पालन करने को अपनी हेठी समझते हैं...क्या थोडी सी छूट मिलते ही हमारा दिमाग खराब हो जाता है?

ऊपर जिस सर…

सिगरेट के धुएं का छल्ला उडा के....

कुछ महीने पहले एक आदेश जारी हुआ था(शायद केन्द्र सरकार द्वारा), कि बडे परदे पर धूम्रपान दिखाया जाना प्रतिबंधित किया जायेगा.
इसे लागू करने की तारीख भी घोषित की गई थी(शायद २ अक्तूबर २००४ से). फिल्म वालों ने काफी हो हल्ला भी मचाया था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न भी उठा था लेकिन सरकार अडी रही थी और आदेश वापस नही हुआ था..
लेकिन भारत देश के अन्य असंख्य कानूनों क़ी तरह इसका भी अनुपालन करने का शायद किसी का कोई विचार है नही...अभी २-४ दिन पहले 'एक अजनबी' देख रहा था, अर्जुन रामपाल धडल्ले से छल्ले उडा रहे थे....और भी कई फिल्में होंगी, जो मैने नही देखी
कुछ सवाल उठते हैं...
जब कानून के पालन की कोई मंशा नही होती , तो बनाने की खुजली क्यों चलती है? किसी ने कहा था इस तरह का कानून बनाने को? या और कोई कारण था (सिगरेट कंपनियों से मोटा चंदा वसूलना था?)
अगर उल्लंघन हो रहा है, तो सजा क्या हो?
परदे पर धूम्रपान दिखाया जाना ज्यादा आपत्तिजनक है, या 'गरमागरम' सीन?

नया साल, वही चाल ढाल....

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नया साल आप सबको(और मुझे भी)बहुत बहुत मुबारक
ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि नये साल में मेरी और आप सबके मन की मुरादें पूरी हों
कँवारों की शादी हो जाये (मैं तो अभी Underage हूँ), बेरोजगारों को नौकरी मिले (वो तो मुझे भी चहिये, wish me luck),जिनके शटर गिर चुके हैं वे फिर से लिखना शुरू करें, हिन्दी ब्लोगर्स की संख्या हजार के पार पहुँचे, मै नियमित रूप से लिखता रहूँ, रोज नहाऊं, कम सोऊं....आदि आदि



कुछ और भी मुरादे और कल्पनाएं हैं, जरा गौर फरमाइये...

दादा टीम में बने रहे, और जब निकाला जाये, तो ससम्मान निकलें
उमा भारती के गुस्से से शिवराज सिंह चौहान बचे रहें
अबू सलेम इसी तरह मुम्बई पुलिस की मेहमान नवाजी कबूलता रहें, (तब तक राम गोपाल वर्मा उसकी जेल लाइफ पर भी २-४ फिल्में बना देंगे)
हिन्दी फिल्मों से कहानी , बिल्कुल कांग्रेस से नटवर सिंह की तरह गायब हो जाये और 'किसिग सीन' ग्रेग चैपल की तरह सुर्खिओं में बने रहें
हफ्ते में एक की दर से स्टिंग आपरेशन होते रहें
देश सूनामी, भूकम्प और मुम्बई बरसात जैसी आपदाओं से बचा रहे
सेंसेक्स १०-१२ हजार तक तो पहुँच ही जाये
टीम इंडिया पाकिस्तान सीरिज जीत कर आये
सट्टे औ…