Tuesday, June 27, 2006

....कारवाँ बनता गया.

नारद के पुरालेख वाले हिस्से पर नजर डालेंगे तो पायेंगे कि २००६ में अभी तक हिंदी चिट्ठों पर करीब 3000 प्रविष्टियाँ लिखी जा चुकी हैं...खुशी की बात यह है कि २००५ के पूरे साल में जितना लिखा गया था, उससे ज्यादा २००६ की पहली छमाही में ही छाप दिया गया,(यह संख्या सिर्फ उन चिट्ठों की है जिनकी खबर नारद को है...वास्तविकता में यह इससे काफी ज्यादा हो सकती है) और यह सही मायनों में हिन्दी ब्लागमंडल(और अन्तर्जाल)पर हिन्दी के प्रसार का द्योतक है...आशा करते हैं कि २००६ की दूसरी छमाही में हम इससे भी दुगुना-तिगुना-चौगुना लिखेंगे...

साथ ही मैं यह भी आशा करता हूँ कि आने वाले समय में हिन्दी चिट्ठों में विविधता बढती जायेगी....जो कि इन्हे समृद्ध बनाने के लिये काफी जरूरी है...करीब साल भर पहले तक अधिकतर चिट्ठे साहित्यिक हुआ करते थे...मैने खुद अपने चिट्ठे की शुरुआत अपने कुछ कविताओं से की थी...जिन्हे कोई नही पढता था...लेकिन अब काफी बदलाव आ रहा है साहित्यिक के साथ तकनीकी ज्ञान , खबरी, धार्मिक चिट्ठे भी दिखाई दे रहे हैं...हाँ टोने-टोटके की आलोचना और इसके बंद किये जाने का मुझे दुख हुआ...

परिचर्चा के आने से लोगों के बीच संवाद भी बढा है..हाँ इसका चिट्ठाकारी पर क्या असर पडेगा ये देखना होगा...क्योंकि कम से कम एक ऐसे चिट्ठाकार को तो मैं जानता हूं, जिन्होने परिचर्चा शुरु होने के बाद से चिट्ठे पर लिखना कम कर दिया है(और इस बात को स्वीकार भी किया है)...बाकि लोगों के क्या हाल है कृपया अवगत कराएं

एक और विचारणीय तथ्य...कई पुराने चिट्ठों के शटर डाउन हो चुके हैं...उम्मीद है कि वे पुनर्जीवित होंगे और फिर से लिखना शुरू करेंगे...

Monday, June 26, 2006

राकेश रोशन की फिल्में

रितिक/राकेश रोशन की नई फिल्म "कृष" के काफी अच्छी से लेकर बहुत खराब समीक्षाएं सुन/पढ चुका हूं..अभी देखी नही है सो अपनी राय तो नही दे सकता, लेकिन राकेश रोशन निर्देशित फिल्मों(पिछली ४-५)को देखें..और जरा गौर करें तो पायेंगे कि कुछ आधारभूत बातें उनकी हर फिल्म में एक जैसी होंगी..जैसे
फिल्म के पहले आधे भाग में हीरो बिल्कुल सीधा साधा होगा...हीरो-हीरोइन मिलेंगे..इश्क-विश्क होगा, गाने गाये जायेंगे...और आप सोंचेंगे...."ये कहाँ आ गये हम..."
मध्यांतर के ठीक पहले, फिल्म में एक अच्छा सा पेंच (twist) दे दिया जायेगा..और यहाँ से फिल्म एकदम रोमांचक मोड ले लेगी..अर दर्शक फिल्म से बंधा हुआ रह जायेगा..
अच्छे गाने/लोकेशन्स/हीरो/हीरोइन तो लगभग हर निर्देशक उपलब्ध करा लेता है, लेकिन आजकल की लगभग सारी फिल्मों में और खासकर रोमांच फिल्मों में सबसे बडी समस्या यहीं आती है, कि पहले हाफ में तो फिल्म ठीक ठाक चलती है,लेकिन मध्यांतर के बाद निर्देशक फिल्म पर अपनी पकड खो देता है...और अंत आते आते तो ऐसा लगता है कि जबरन फिल्म को खत्म किया जा रहा है...
अगर कोई निर्देशक फिल्मे के दूसरे भाग पर पकड मजबूत रखे...तो सफलता की संभावना भी बढ जाती है...

Monday, June 05, 2006

सुर्खियों से हट कर

आज आरक्षण,महाजन,आमिर खान,लाभ का पद,क्रिकेट इत्यादि के अलावा कुछ बातें...

क्या आपको गेहूँ के भाव पता हैं?....
पिछले कुछ दिनों(महीनों)से १० रुपये प्रति किलो से १८-२० रुपये प्रति किलो तक चल रहे हैं
सरकार देश के किसानों से ७ रुपये किलो गेहूँ खरीद रही है, और दूसरे देशों से १० रुपये किलो तक में आयत कर रही है
उडद मूँग चना तुवर आदि दालों के भाव ४६ से ६० रुपये प्रति किलो जा पहुँचे हैं..
शकर २०-२१ रुपये किलो हो गई है
सब्जियों के दाम भी कमोबेश आसमान छू रहे हैं (वैसे मैने बहुत दिन से खरीदी नही)
चांदी १८-१९००० रुपये प्रति किलो....साल डेढ साल पहले तक ८-१० हजार रुपये प्रति किलो थी
सोना ९-९५०० रुपये प्रति दस ग्राम...साल डेढ साल पहले तक ६-७००० रुपये प्रति दस ग्राम था
रेलवे स्टेशनों पर सार्वजनिक नलों में पानी नही मिलता हर जगह् बोतलबंद पानी जो उपलब्ध है... पेट्रोल और डीजल के दाम के बारे में कुछ ना कहना ही बेहतर है....अभी कल ही फिर बढा दिये...
शहरों में और महानगरों में एक आम आदमी के लिये अपना एक घर खरीद पाना असंभव सा हो गया है

अभी कुछ समय पहले सुनील जी ने सपनों पर एक लेख लिखा था...आप बताइये कोई कैसे करेगा अपने सपने पूरे जब रोटी, कपडा और मकान जैसी मूलभूत सुविधाएं ही आम इंसान के लिये मुश्किल हो रही है.६० रुपये की न्यूनतम मजदूरी तो छोडिये, क्या १००-१२५ रुपये रोज कमाने वाला एक आदमी भी इस महँगाई में ४ लोगों के परिवार का खर्च ठीक से चला सकता है?
सपनों के ऊपर आगे और लिखूंगा, लेकिन यह तो सोंचने की बात है ही कि हमारे अखबार पत्रिकाएं और न्यूज चैनल इन सब खबरों को अपनी सुर्खियाँ क्यों नही बन्नते, जबकि ये खबरें आम आदमी से सबसे ज्यादा सरोकार रखती हैं...