Tuesday, December 13, 2005

अपनी 'खोल' से बाहर...

बहुत दिनों से मैने कोई किताब नही पढी. २ महीने से बाहर होने की वजह से समय भी नही मिल पाता था...बीच में पाउलो कोहेलो की "द अल्केमिस्ट" पढी थी, पर वो मैने पहले ही पढी हुई थी...इसके अलावा सुरेन्द्र मोहन पाठक के एक्-दो उपन्यास ट्रेन में पढे थे, पर कोई serious reading नही हुई थी.

कल स्टीव वा की आत्मकथा,"आउट आफ माय कम्फ़र्ट जोन" (Out of My comfort Zone) हाथ लगी है, उसे निपटा रहा हूँ, इस सप्ताह में खत्म करने का मानस बनाया है.हिन्दी में शायद इसका मतलब होगा, "अपने सुरक्षा कवच(या 'खोल') से बाहर"...

आमुख की दो पंक्तियाँ काफी अच्छी लगी,यहा चिपका रहा हूँ
"....I have come to learn that life wouldn't be as enjoyable if it was always easy, and that personal growth comes from having to move out of your comfort zone...."

मैने भी कई बार अनुभव किया है कि इस Comfort Zone से एक बार निकलना काफी मुश्किल होता है, किन्तु यदि निकल गये, तो काम मे बडा मजा आता है और सफलता की संभावना भी ज्यादा रहती है....लेकिन इस जंजीर को तोडना होता बडा दुष्कर है...

3 Comments:

At December 14, 2005 3:12 AM, Blogger Pratyaksha said...

बिलकुल सही कहा आपने, पहला कदम ही मुश्किल होता है.आगे फिर सब आसान.
प्रत्यक्षा

 
At December 14, 2005 1:06 PM, Anonymous ई-स्वामी said...

मित्र तुमने जो लिखा है उसे कभी मत भूलना - जब तक याद रखोगे और निभाओगे ये सच अंतर्मन से जवान रहोगे.

 
At December 15, 2005 7:27 PM, Blogger Hemu said...

Before changing the world we need to change ourself,another funda on the same lines.
*Hemu*

 

Post a Comment

<< Home